90’s का वो सुनहरा बचपन और ये 7 काम, बचपन की याद ना दिला दे तो कहियेगा ये कहना गलत नहीं होगा कि 90 के दशक का बचपन सबसे बेस्ट था. इस दौर में हर बच्चे ने ये 7 काम जरूर किये होंगे.

एक बार फिर बचपन की उन हंसी वादियों में लौटने का मन करता है. एक बार फिर मन करता है कि मम्मी-पापा का हाथ पकड़कर मार्किट घूमने जाएं. एक बार फिर मन करता है कि नानी-दादी के साथं लेटकर राजकुमार और परियों की कहानी सुनें. एक बार फिर मन करता है कि दोस्तों के साथ छुप्पन-छुपाई खेलें. एक बार फिर मन करता है कि मां की गोद में लेटे-लेटे सो जाएं. एक बार फिर मन करता है कि पापा के ऑफिस से आने का इंतजार करें और फिर सब साथ में खाना खाएं. काश…वो बचपन कोई लौटा देता. एक बार जो टाइम बीत गया उसे वापस लाना नामुमकिन है लेकिन उन यादों को कुछ चीजों के जरिये हम एक बार फिर जी सकते हैं. अगर मैं ये कहूं कि 90 के दशक का बचपन सबसे बेस्ट था तो इस बात से हर कोई इत्तेफाक रखेगा. आज के इस पोस्ट में हम आपको 90’s की कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं जो एक बार फिर आपकी बचपन की यादों को ताज़ा कर देंगे.

हमारा बजाज स्कूटर

90’ के दशक में सबसे ज्यादा मजा पापा के स्कूटर पर ही आता था. स्कूटर से स्कूल के गेट पर उतरने का एक अलग ही भौकाल था.

छुट्टियों का पक्का साथी

90 के दशक में कॉमिक्स का दौर था. पॉकेटमनी मिलते ही हम सबसे पहले कॉमिक्स खरीदा करते थे. चंपक, चाचा चौधरी, शक्तिमान हमारे फेवरेट कॉमिक्स हुआ करते थे.

टीवी देखने पर मम्मी की वो डांट

90 के दशक में हर बच्चे ने टीवी देखने पर अपनी मां से डांट खायी होगी. ‘बस टीवी देखते रहना, पढ़ाई मत करना’ हर मम्मी का फेवरेट डायलॉग हुआ करता था.

कुल्फी वाले की वो टन-टन

कुल्फी वाला टन-टन करते हुए आता था और भरी दुपहरी में हम कुल्फी लेने निकल जाया करते थे. गर्मी में ठंड का अहसास दिलाने का ये सबसे बढ़िया तरीका था.

पल में दोस्ती, पल में दुश्मनी

जरा सी बात हुई नहीं कि अपने बेस्ट फ्रेंड से कट्टी-अब्बा हो जाया करती थी. इतना ही नहीं, एक-दूसरे को दिया सामान भी वापस कर दिया करते थे. लेकिन दोस्त की कोई बुराई करता था तो मार-मिटने को तैयार रहते थे.

लेटर लिखना

आजकल भले ही तरह-तरह के एप्स आ गए हों लेकिन पहले लोग चिट्ठी में यकीन रखते थे. जो बात लेटर में होती थी वो व्हाट्सएप और बाकी चीजों में कहां.

फ्लेम्स गेम

90 के दशक में लगभग हर बच्चा अपनी कॉपी के पीछे ये गेम खेलता था. फ्लेम्स के जरिये वह पता करने की कोशिश करता था कि उस लड़की या लड़के से फ्यूचर में कैसी दोस्ती होगी. याद है न ये मजेदार गेम?

हमें यकीन है कि इस आर्टिकल को पढ़कर आपको भी अपना बचपन याद आ गया होगा. वाकई बचपन के दिन बहुत हसीन होते हैं. बचपन के दिनों के आगे धन-दौलत और सभी गैजेट्स फीके पड़ जाते हैं. काश एक ऐसे टाइम मशीन होता जिसके जरिये हम वापस अपने बचपन मेकिं जा पाते.

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