अमरिका,रूस,एशिया सब बसे हैं इस घर में, मिलिए इस परिवार से जिसमें दुनिया सिमट गयी है

अमरिका, एशिया, यूरोप की सैर करनी हो तो शायद महीनों लग जाए क्योंकि ये सब दुनिया के अलग अलग खंडो में बसे हैं लेकिन हम आपकों भारत में ही एक ऐसी जगह बता रहे है जहां आप इनसे एक साथ रबरू हो सकते हैं और इसके लिए ना तो बीजा का झंझट है, ना ही महीनों का समय और ढ़ेर सारे पैसे लगने वाले हैं। इससे पहले कि आपकी उलझन बढ़ जाए हम आपको बता दें कि ये एक परिवार हैं जिसमें एक साथ अमरीका,एशिया और रूस जैसे नाम के लोग एक छत के नीचें रहते हैं।

50 सालों से चली आ रही परम्परा ने पूरी दुनिया को सिमट दिया है एक परिवार में

असल में महाराष्ट्र के पूर्वी विदर्भ के गोंदिया जिले मे एक परिवार में देश दुनिया के नाम पर अपने बच्चों का नाम रखने का चलन है। गोंदिया जिले के खोङसिवनी गांव में रहने वाले मेश्राम परिवार में ये चलन 50 सालों से चला  रहा है.. परिवार की दादी सुभद्राबाई ने अपने बेटे का नाम भारत रखा और चार बेटियों के नाम रशिया, अमरिका, एशिया और अफ्रीका रखा …फिर उनके बेटे और बेटियों ने माँ की राह पर चलते हुए अपने बच्चों के नामकरण भी इसी हिसाब से कर दिए । परिवार के मुखिया 48 वर्षीय भारत ने अपने लङके का नाम यूरोप और लङकी का नाम ऑस्ट्रेलिया रखा, उधर इनकी बहन अमरिका ने अपने बच्चों के नाम राज्यपाल और राष्ट्रपति रख दिया  और अब परिवार की तीसरी पीढ़ी भी इस परम्परा का निर्वाह करने का मन बना चुकी है। 22 वर्षीय यूरोप कहते हैं कि वो अपनी स्वर्गीय दादी के नामकरण की इस विशेष शैली को जरूर अपनाएंगे, उनके लिए यही उनकी दादी के प्रति सच्ची श्रद्दांजली होगी।

जातिगत विषंगतियों को दूर करने के लिए अपनाई अनूठी परम्परा

भारत मेश्राम बताते हैं कि उनकी माँ ने एक खास वजह इसकी शुरूआत की थी.. दरअसल दलित सुभद्रा देवी अपने गांव में दाई का काम करती थीं ..उनके हांथों गांव के सभी बच्चों के जन्म होते पर लोग उन्हें और उनके पेशे को हेय दृष्टि से देखते थें । गांव में व्यापत इस जातिगत भेदभाव से सुभद्रा देवी का मन जब खिन्न हुआ तो उन्होनें इसका प्रतिरोध करने के लिए एक अनोखा तरिका सोचा कि …क्यों ना अपने बच्चों के नाम कुछ यूँ रखा जाए जो ना सिर्फ जाति की बेङियो को तोङ़ सके बल्कि देश और स्थान विशेष की सीमा को ही खत्म कर दे । बस इसी सोच के साथ अपने बच्चों के नाम देश विशेष पर रख दिए और वास्तव में सुभद्रा देवी की ये पहल सराहनीय है जो  लोगों को जाति की संकीर्ण सोच से बाहर लाकर वसुधैव कुटंबकम का पाठ सीखा रही है ।

नामविशेष के कारण परिवार को आलोचनाएं भी झेलनी पङी

एकतरफ जहां अनपढ़ सुभद्रा देवी के इस कदम से लोगों ने मानवता और एकता का पाठ पढ़ा तो वहीं दूसरी तरफ ऐसे खास नाम के लिए उनके परिवार को ताने भी झेलने पङें, बच्चें अपने नाम के लिए मजाक तक बनाए गए । इसीलिए भारत मेश्राम ने स्कूल में सुभाष चन्द्र बोस के नाम से दाखिला लिया था। उनके बेटे यूरोप को भी स्कूली दिनों में अपने नाम के चलते काफी परेशानियों का सामना करना पङा।

लेकिन इन सबके बावजूद आज महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव का यह सामान्य सा परिवार, अपनी विशेष परम्परा और उसके पीछे की बङी सोच के लिए ना सिर्फ अपने गांव, क्षेत्र में जाना जा रहा है बल्कि पूरे देश में सुर्खियां बटोर रहा है।

 

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