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आज ही के दिन 70 साल पहले अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर गिराया था परमाणु बम, जानें!

आज ही के दिन अमेरिका ने 70 साल पहले जापान के नागासाकी और हिरोशिमा शहर पर परमाणु बम गिराया था। 6 अगस्त 1945 की सुबह अमेरिकी वायु सेना ने जापान के हिरोशिमा पर परमाणु बम “लिटिल बॉय” गिराया था। तीन दिनों बाद अमरीका ने नागासाकी शहर पर “फ़ैट मैन” परमाणु बम गिराया। हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम को अमेरीका पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूज़वेल्ट के सन्दर्भ में “लिटिल ब्वाय” और नागासाकी के बम को विन्सटन चर्चिल के सन्दर्भ में “फ़ैट मैन” कहा गया।

हमले में मारे गए गए लोगों के लिए रखा गया मौन:

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अमेरिका ने जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर किये गए हमले का बदला लेने के लिए अमेरिकी बॉम्बर प्लेन बी-29 से जमीन से लगभग 31000 फीट की ऊँचाई से परमाणु बम गिरा दिया था। आज सुबह स्थानीय समय के अनुसार 8 बजे जापानी प्रधानमंत्री समेत कई लोगों ने हमले में मारे गए लोगों के लिए मौन रखा। हमले में लगभग 1.4 लाख लोगों की मौत हो गयी थी। जो लोग बम के हमले से बच गए थे वह परमाणु बन के रेडिएशन में मारे गए।

लोगों की याद में हमेशा जलती रहती है मशाल:

आज पहली बार इस मौके पर वाशिंगटन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने शिरकत किया। पीएम मोदी ने ट्वीट करके कहा कि, ‘हिरोशिमा परमाणु हमले में जान गंवाने वालों को मैं श्रद्धांजलि देता हूं। परमाणु बम हमला हमें युद्ध की भयावहता और मानवता पर उसके दुष्प्रभाव की याद दिलाता है।’ जापान के हिरोशिमा शहर के पीस पार्क में मारे गए लोगों की याद में एक मशाल हमेशा जलती रहती है।

परमाणु हमले से उत्पन्न होता है 4000 डिग्री सेल्सियस:

इस मशाल के बारे में यह कहा जाता है कि जब तक दुनिया में व्यापक विनाश का एक भी हथियार है, यह मशाल जलती रहेगी। इस हमले में आस-पास की सभी चीजें जलकर खाक हो गयी थी। परमाणु बम के हमले के बाद लगभग 4000 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान उत्पन्न होता है जो स्टील को भी पिघला देता है। हमले को आज 70 साल हो गए हैं, लेकिन आज भी वहाँ के लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

हमले के बाद जापान ने कर दिया था आत्मसमर्पण:

हमले के कुछ दिन बाद 15 अगस्त 1945 को जापान ने अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, इसके बाद युद्ध समाप्त हो गया। गिराए गए परमाणु बम के बारे में कहा जाता है कि परमाणु बम का निर्माण 1941 में उस समय शुरू हुआ था जब नोबेल विजेता वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलीन रूजवेल्ट को इस प्रोजेक्ट को फंडिंग करने के लिए राजी किया। उस समय खुद आइंस्टी न ने भी नहीं सोचा होगा कि इसके इतने घातक परिणामों हो सकते हैं।

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