राजनीति

जानिए क्या हुआ था जब ‘वामपंथि हुए थे हिं’सक, इंदिरा ने 46 दिनों के लिए करवा दिया था JNU बंद

जेएनयू की स्थापना भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के द्वारा 1969 में की गयी थी. वैसे जेएनयू की स्थापना होने के बाद जेएनयू कैंपस वामपंथी विचारों को केंद्र बन गया. इसी वजह से जवाहर लाल नेहरू के द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद कांग्रेस पार्टी के मन को हमेशा यह बात खटकती रही है कि जेएनयू मंस कभी कांग्रेसी विचारधारा को बढ़ावा नहीं मिला. आज के समय में वामपंथी विचारधाराओं से भरपूर जेएनयू कैंपस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अर्थात एबीवीपी लोहा ले रही है और साल 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के पश्चात एक बार फिर से जेएनयू में वामपंथी विचारों वाले छात्रों के खून में उबाल है.

अगर आज के समय में विरोध प्रदर्शन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की पहचान बन चुका है, तो पुराने समय से ही इस विश्वविद्यालय के साथ हिंसा के अंदरूनी संबंध रहे है. वैसे बहुत सारे लोगों का ऐसा मानना है कि सीए (नागरिकता संशोधन कानून) के ऊपर सरकार के कड़े रुख की वजह से अचानक लोगों के मन में पैदा हुई यह भावना का ज्वार है. जो उत्तेजित होकर दंगा फसाद करने पर उतारू हो गया है, पर क्या आपको पता है की अतीत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में इससे भी ज्यादा हिंसा हो चुकी है. जिस वक्त इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी तब जेएनयू में बहुत ज्यादा हिंसा भड़क गई थी. जिसकी वजह से इंदिरा गांधी को जेएनयू यूनिवर्सिटी को 46 दिनों के लिए बंद करने पर मजबूर होना पड़ा था.

दो विरोधी दल वामपंथी संगठन इस मामले में आमने-सामने हैं. इन सभी घटनाओं का इतिहास यह बताता है कि अगर पेरियार हॉस्टल के अंदर 2019 में हुए दंगे फसाद खौफनाक थे तो 1980 में हुए बवाल जैसा पहले कभी भी नहीं देखा गया था. जेएनयू की स्थापना के पूरे 12 सालों के बाद इंदिरा गांधी को इसे 16 नवंबर 1980 से लेकर 3 जनवरी 1981 तक बंद करने पर मजबूर होना पड़ा था. हालात को नियंत्रित करने के लिए जेएनयू स्टूडेंट यूनियन प्रेसिडेंट राजन जी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. लेखक मिन्हाज मर्चेंट जिन्होंने राजीव गांधी की जीवनी लिखी थी उनका कहना है “जेएनयू में वामपंथी द्वारा फैलाई गई हिंसा का इतिहास बहुत ही लंबा है.

इसे नवंबर 1980 से लेकर जनवरी 1981 के समय भी छात्रों की हिंसा की वजह से बंद करना पड़ा था, पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी माकपा पोलित ब्यूरो नेता सलीम ऐसा मानते हैं कि 46 दिनों कि यह बंदी 2020 की अपेक्षा कम खतरनाक थी. इस घटना पर सवाल पूछे जाने पर सलीम ने कहा “किसी ने सीताराम येचुरी को उस तरह से नहीं मारा था जिस तरह आईसी घोष को पीटा गया है. इंदिरा गांधी ने उस समय दिल्ली पुलिस का इस्तेमाल नहीं किया था जिस तरह आज के समय में मौजूदा सरकार कर रही है” वैसे आज के समय में वाम दल नेता वर्तमान राजनीतिक बाध्यता से प्रेरित हैं. क्योंकि 1980 में न केवल तत्कालीन जेएनयू प्रेसिडेंट को पुलिस ने गिरफ्तार किया था बल्कि व्यापक पैमाने पर पूरी तरह से शिकंजा कसा गया था.

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