हर साल इस कश्मीरी लड़की से मिलते हैं लेफ्टिनेंट विजयंत थापर के पिता, जानिये आखिर कौन है वो लड़की

अक्सर फिल्मों में कारगिल की लड़ाई देखने वाले इमोशनल हो जाते हैं लेकिन जो कहानी हम फिल्मों में देखते हैं उससे ज्यादा दर्दनाक एक फौजी की असल जिंदगी होती है। कुछ ऐसी ही कहानी रही है शहीद लेफ्टिनेंट विजयंत थापर की जो एक जिंदादिल इंसान थे और ड्यूटी के समय अपने दिल की सुनने की सजा उन्हें पाकिस्तानियों ने दे दी। कश्मीर की घाटियों में रहते हुए लेफ्टिनेंट से मिली और हर साल इस कश्मीरी लड़की से मिलते हैं लेफ्टिनेंट विजयंत थापर के पिता, क्या आप जानते हैं कौन है ये लड़की ?

हर साल इस कश्मीरी लड़की से मिलते हैं

साल 1999 का समय समय था जब कारगिल युद्ध के दौरान कई फौजियों ने अपनी जान गंवाई थी और इसमें से एक थे लेफ्टिनेंट विजयंत थापर जिन्होंने अपनी वीरता से कई पाकिस्तानियों को धूल चटाई लेकिन आखिर में पाकिस्तानियों के गलत मंसूबों की भेंट चढ़ गए। उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत वीरता पुरस्कार भी मिला जिसे उनकी दादी ने तत्कालीन राष्ट्रपति से ग्रहण किया था। लड़ाई पर जाने से पहले थापर ने अपने माता-पिता को एक खत लिखा और उसे अपने साथियों को देते हुए कहा कि अगर वो जिंदा लौटे तो इसे फाड़कर फेंक देना और अगर शहीद हुए तो उनके माता-पिता तक पहुंचा दिया जाए। उस खत में लिखा था,

डियरेस्ट पापा, मां, बर्डी एंड ग्रैनी जब तक ये पत्र आपको मिलेगा, मैं आसमान से अप्सराओं के साथ आपको देखूंगा। मुझे कोई दुख नहीं है और अगले जन्म में अगर मैं फिर इंसान बना तो दोबारा सेना में भर्ती होकर देश के लिए लडूंगा और भारत मां की सेवा करूंगा। अगर संभव हो तो यहाँ आइए ताकि आप अपनी आँखों से देख सकें कि आपके कल के लिए भारतीय सेना ने किस तरह से लड़ाई लड़ी है. मेरी इच्छा है कि आप अनाथालय में कुछ पैसे दान दें और हर महीने 50 रुपये रुख़साना को उसकी स्कूल की और ट्यूशन फ़ीस भी देते रहिएगा। समय आ पहुंचा है कि मैं अपने ‘डर्टी डज़ेन’ से जा मिलूँ. मेरी हमलावर पार्टी में 12 लोग हैं.

लेफ्टिनेंट के पिता कर्नल वीरेंदर थापर बताते हैं कि कुपवाड़ा में एक जगह कांडी है जहां एक स्कूल में भारतीय सैनिकों को रखा गया था और उसके सामने एक झोपड़ी के सामने 3 साल की लड़की खड़ी थी और रोबिन ने उसके बारे में पूछताछ किया तो पता चला कि चरमपंथियों ने मुखबरी के शक में उसके सामने ही उसके पिता की हत्या कर दी थी और तब से दहशत में उस लड़की ने बोलना बंद कर दिया। विजयंत जब उसे देखता तो मुस्कुराता और उसे वेव करता था और कभी-कभी गाड़ी रोककर उसे चॉकलेट देते थे। उसने अपनी मां को पत्र लिखकर बोला था कि एक सलवार-कमीज सिलवा दें जब वो इस बार घर आएगा तो ले जाएगा।

लेफ्टिंट के पिता आगे बताते हैं कि विजयंत उस लड़की के इतना करीब थे कि उन्होंने अपने आखिरी खत में उसके बारे में हमें बोला कि उसका ख्याल रखिएगा। उसे हर महीने 50 रुपये भेजते रहें और आज वो 22 साल की हो गई है। इस बार हमने उसे एक कंप्यूटर भेंट किया था और उसकी शादी में एक खास तोहफा देंगे जो हमारे शहीद बेटे की तरफ से होगा।

जिंदादिली की मिसाल थे लेफ्टिनेंट

साल 1999 में एक बड़ी चट्टान की आड़ लिए लेफ्टिनेंट विजयंत थापर लेटे हुए थे और दो पाकिस्तानी ठिकानों पर कब्जा कर चुके थे। तीसरा ठीक उनके सामने था और वहां से उस पर मशीनगन का जबरदस्त फायर हुआ थापर ने तय किया कि मशीन गन के लिए ठंडा किया जाए। उनका दिमाग कहता है कि चट्टानों की आड़ लिए फायरिंग जारी रखी लेकिन विजयंत तो हमेशा अपनी दिल की सनते थे। चट्टान पर बैठा पाकिस्तानी सैनिक उन्हें देख लेता है और वो बहुत ही सावधानी के साथ लेफ्टिनेंट थापर पर गोली चला देता है। गोली उनके बांए माथे में घुसकर दांईं आंखों से बाहर आ जाती है। उनका पूरा शरीर खून से भरा था और उन्होंने अपनी आखिरी सांस में भारत माता की जय बोला था।बताया जाता है कि लेफ्टिनेंट विजयंत जब घर आते थे तब पूरा घर खुशनुमा रहता था और उस दौरान उनके दोस्तों और रिश्तेदारों से घर भरा रहता था।  वे हमेशा लोगों को हंसाते और किसी का दिल ना दुखे ऐसी कोई बात नहीं कहते थे।