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नेत्रहीन होने के कारण रेलवे ने जॉब नहीं दी, फिर IAS टॉप कर ऐसे दिया मुंहतोड़ जवाब

‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’, ‘इस दुनियां में कुछ भी असंभव नहीं.’ ये दोनों ही कहावते हम सभी ने कई बार सुनी या पढ़ी हैं. लेकिन इसे असल जीवन में लागू करने का साहस बहुत कम लोगो में होता हैं. अक्सर हम अपनी लाइफ की छोटी मोटी समस्याओं को बहाना बनाकर अपने लक्ष्य को पूरा करने में आलसी कर जाते हैं. रास्ते में थोड़ी सी भी बाधा आ जाए तो हिम्मत हार जाते हैं. लेकिन आज हम आपको एक ऐसी लड़की से मिलाने जा रहे हैं जिसने असंभव का को संभव करने का ना सिर्फ सोचा बल्कि उसे रियल लाइफ में कर के हर किसी को हैरान कर दिए.

इनसे मिलिए. ये हैं महारष्ट्र के उल्हासनगर की रहने वाली नेत्रहीन प्रांजल पाटिल.

प्रांजल जब 6 साल की थी तो स्कूल में एक बच्चे ने गलती से उनकी आँख में पेन्सिल मार दी थी. इससे उनकी एक आँख की रौशनी चली गई. प्रांजल इस दुःख से उभर ही रही थी कि उनकी दूसरी आँख में भी इन्फेक्शन फ़ैल गया और वो उनकी दोनों ही आँखों की रौशनी चली गई. इस स्थिति में कोई दूसरा होता तो शायद खुद को दुःख और डिप्रेशन में डाल लेता और जीवन में आगे कुछ ना कर पाता. लेकिन प्रांजल ने अपनी इस अक्षमता को साइड में रख दुनियां को मुट्ठी में करने की ठान ली.

प्रांजल के पिता ने उनका एडमिशन मुंबई के श्रीमति कमला मेहता स्कूल में कराया जहाँ नेत्रहीन बच्चों को ब्रेल लिपि के द्वारा पढ़ाया जाता था. यहाँ 10वीं तक पढ़ने के बाद उन्होंने चंदाबाई कॉलेज से 12वीं (आर्ट्स) किया और 85 प्रतिशत अंक हासिल किये. वे यही नहीं रुकी और सेंट जेवियर कॉलेज से बीए भी पूर्ण किया. इस दौरान प्रांजल को एक फ्रेंड से UPSC सिविल सर्विस के बारे में पता चला और उन्होंने तभी आईएएस बनने के लिए कमर कस ली. उन्होंने दिल्ली के जेएनयू से एमए भी किया. प्रांजल ने साल 2015 में UPSC एग्जाम की तैयारियां स्टार्ट कर दी थी. इसके साथ ही वे एमफील भी कर रही थी. इन सबके बीच उनके पास केबल ऑपरेटर कोमल सिंह पाटिल की और से शादी का रिश्ता आया. प्रांजल ने शादी के लिए बस एक ही शर्त रखी कि वे ब्याह हो जाने के बाद भी पढ़ाई जारी रखेगी.

इसके बाद प्रांजल ने अपने पेरेंट्स, पति और दोस्तों के सपोर्ट के साथ UPSC परीक्षा पहले ही प्रयास में 773वां रैंक हासिल कर उत्तीर्ण कर ली. दिलचस्प बात ये थी कि इसके लिए उन्होंने कोई कोचिंग भी नाह लगाईं थी. प्रांजल रेलवे में आई.आर.एस. बनने का सपना देख रही थी. लेकिन रेलवे विभाग के कुछ अधिकारीयों ने प्रांजल के इस सपने को ये कहकर तोड़ दिया कि वो पूर्णरूप से दृष्टिहिन होने की वजह से इस पद के काबिल नहीं हैं. प्रांजल को ये बात बहुत बुरी लगी. उन्होंने कहा कि मेरी आँखें नहीं आपकी सोच दिव्यांग हैं. इसके बाद प्रांजल ने उन्हें करारा] जवाब देने के लिए दुबारा UPSC परीक्षा की तैयारी करना शुरू कर दिया. इस बार दुसरे प्रयास में ही 124 रैंक लाकर उन्होंने रेलवे विभाग को करार जवाब दे दिया. इसके साथ ही उन्होंने दिव्यांग वर्ग में अव्वल स्थान प्राप्त किया.

प्रांजल की ये कहानी हम करोड़ो लोगो के लिए एक प्रेरणा हैं. प्रांजल ने इस कहावत को रियल लाइफ में सच साबित कर दिया कि ‘कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती.’

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