उस जेल में पहुँचकर भावुक हुए मोदी, जहाँ दी जाती थी ‘काला पानी की सजा’, अंदर जाकर किया यह काम

अपने पांच साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार अंडमान-निकोबार गए. यहां पर वो सेल्युलर जेल के अंदर गए जहां पर उन्होंने शहीदों को श्रद्धांजलि भी दी. नरेंद्र मोदी उन्हें श्रद्धांजलि देने के बाद उस कोठरी में भी पहुंचे जहां पर वीर सावरकर को रखा गया था. ब्रिटिश शासन में कालापनी की सजा के दौरान वीर सावरकर को स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े होने के कारण दोहरा आजीवन कारावास की सजा दी गई थी और अंडमान-निकोबार की इसी जेल में रखा गया था. उस जेल में पहुँचकर भावुक हुए पीएम मोदी, जहाँ दी जाती थी भारतीयों को ‘काला पानी की सजा’, यहां पर पहुंचते ही उस सेल में नरेंद्र मोदी ने ध्यान लगाया जहां पर सावरकर को रखा गया.

भावुक हुए पीएम मोदी, जहाँ दी जाती थी भारतीयों को ‘काला पानी की सजा’,

अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर बनी सेल्युलर जेल में आज भी काला पानी की कहानी प्रचलित है. भारत जब ब्रिटिश शासन का गुलाम था तब भारतीयों पर अंग्रेजी सरकार कहर ढाती थी. हजारों सेनानियों को फांसी दे दी गई और कई लोगों को तोपों से मुंह बांधकर उड़ा दिया गया. कुछ सेनानी तो ऐसे थे जिन्हें तड़पा-तड़पाकर मारा गया. किसी को प्रताड़ित करके मारना होता था तब ब्रिटिश सरकार उसे इसी जेल में लाकर तिल-तिल करके मारती थी.

अंडमान के पोर्ट ब्लेयर सिटी में बनी इस जेल की चारो दीवारें बेहद छोटी हैं कि कोई भी आसानी से दीवार पार करके भाग सकता है लेकिन दीवार के उस पार चारो ओर समुद्र ही समुद्र है. सबसे पहले 200 विद्रोहियों को जेलर डेविड बेरी और मेजर जेम्स पैटीसन वॉकर की सुरक्षा में लाया गया और इसके बाद करीब 733 विद्रोहियों को कराची से लाया गया. भारक और बर्मा से भी यहां पर सेनानी तैनात रहते थे. द्वीप होने के कारण विद्रोहियों को सजा देने के लिए अंग्रेज इसे सबसे सही जगह मानते थे और उन्हें यहां पर सिर्फ रखा नहीं जाता था बल्कि उनसे कई तरह के काम लिये जाते थे. यहां आने वाला कैदी ब्रिटिश सरकार से जुड़े लोगों के घरों को बनाते थे.

यहां पर कैदियों को बेड़ियों में रखा जाता था उनसे कोल्हू के बैल की तरह तेल पिरवाया जाता था. एक बार यहां पर 238 कैदियों ने भागने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया तभी एक कैदी ने आत्महत्या कर ली थी और बाकियों को फांसी पर लटकाने का आदेश दे दिया गया था. यहां पर भगत सिंह के सहयोगी महावीर सिंह ने अत्याचार के खिलाफ भूख हड़ताल की थी जेल के कर्मचारियों ने जबरदस्ती उन्हं दूध पिलाया जैसे ही दूध अंदर गया उनकी मौत हो गई थी. इसके बाद उन्हें पत्थर से बांधकर समुद्र में फेंक दिया गया था.

कुछ ऐसा हा सेल्यूलर जेल का इतिहास

सेल्युलर जेल का निर्माण साल 1896 में शुरु हुआ और साल 1906 में ये बनकर तैयार हो गई थी. इसका मुख्य भवन लाल ईटों से बना है जो अंग्रेजों का प्रतीक माना जाता था. इस भवन में 7 शाखाएं और बीचोीबच एक टावर है जिससे सभी कैदियों पर नजर रखी जाती थी. यहां की हर शाखा में तीन मंजिल बनी है और यहां पर कोई शयनकक्ष नहीं बनाया गया सिर्फ 638 कोठरियां हैं. हर कोठरी 15X8 फीट है और तीन मीटर की ऊंचाई पर रोशनदान बना है. इस जेल का नाम सेल्युलर जेल इसलिए रखा गया क्योंकि यहां एक कैदी को दूसरे कैदियों से बिल्कुल अलग रखा जाता है. जेल में हर कैदी के लिए एक अलग सेल होती है जहां पर अकेलेपन के सिवा कुछ नहीं होता. यहां कितने भारतीयों को फांसी दी गई इसकी कोई गिनती नहीं है.