अध्यात्म

चारधाम की यात्रा में क्यों बदरीनाथ यात्रा को बताया गया है सबसे महत्वपूर्ण

न्यूज़ट्रेंड वेब डेस्क: बदरीनाथ धाम चारधाम यात्रा का प्रमुख केंद्र है, कहते हैं पहले यहां नारायण स्वयं दर्शन देते थे, लेकिन जब धरती पर पाप बढ़ा तो नारायण अंतर्ध्यान हो गए।शास्त्रों में कहा गया है धरती पर अनेक तीर्थ हुए हैं, लेकिन बदरीनाथ के समान कोई तीर्थ नहीं है, ना ही भूत में कोई तीर्थ ऐसा था और ना ही भविष्य में होगा।

बदरीनाथ धाम के बारे में कहा जाता है कि ये क्षेत्र कभी शिव क्षेत्र था, एक बार भगवान नारायण तपस्या के लिए कोई ऊचित स्थान देख रहे थे, और वो भ्रमण करते हुए उस क्षेत्र में पहुंचे, जहां शंकर अपनी पत्नी पार्वती के साथ प्रवास कर रहे थे, भगवान नारायण को वो क्षेत्र काफी पसंद आ गया, कहते हैं भगवान नारायण ने उस क्षेत्र को माता पार्वती से लेने का विचार किया, जिसके लिए उन्होंने बालक का रुप धारण कर लिया, और रोने लगे, उनका रोना सुनकर नजदीक ही भ्रमण कर रही माता पार्वती शंकर के साथ वहां पहुंची, उन्होंने बालक को गोद में उठा लिया और घर ले आई, भगवान शंकर ने माता को समझाया कि बालक अबोध नहीं है, बल्कि चालाक  है, घर के भीतर ना ले जाओ, लेकिन माता नहीं मानी और उन्होंने बालक रुपी भगवान नारायण को भवन के भीतर सुला दिया, और दरवाजा बंद कर फिर वन भ्रमण पर निकल गई, जब वापस लौटी तो नारायण ने कपाट नहीं खोले और केदार क्षेत्र में प्रवास करने को कहा।इसके बाद भगवान शंकर केदार क्षेत्र में चले गए और भगवान नारायण बदरीकाश्रम में तपस्यारत हो गये।

एक अन्य कथा के मुताबिक भगवान नारायण जब तपस्या में लीन थे तो काफी वक्त बीत गया, बैकुंठ से लक्ष्मी जी भगवान को खोजने के लिए धरती पर आई, तब उन्होंने देखा कि भगवान तपस्या में लीन हैं और उनके ऊपर बर्फ गिर रही है, तब माता ने बदरी वृक्ष का रुप धारण कर लिया और नारायण के ऊपर बर्फ नहीं गिरने दी, कहते हैं नारायण की आंखें खुली तो उन्होंने लक्ष्मी जी को बदरी के वृक्ष के रुप में देखा, तब नारायण ने माता से कहा कि उस स्थान को बदरीनाथ के नाम से जाना जाएगा।

एक अन्य कथा के मुताबिक भगवान नारायण और उनके भाई नर ने बदरीकाश्रम में बदरी वृक्ष की छांव में एक सहस्र वर्ष तक तपस्या की थी, और वो क्षेत्र बदरीकाश्रम के नाम से जाना जाने लगा।

कहते हैं पहले नारायण यहां स्वयं दर्शन देते थे, लेकिन कालांतर में जब धरती पर पाप बढ़ा तो नारायण अदृश्य हो गए, इसके बाद लोक कल्याण के लिए ब्रह्मर्षि नारद ने भगवान का विग्रह बदरीनाथ में स्थापित कर दिया, और प्रथम अर्चक बने, लेकिन बाद में जब बदरीनाथ धाम में हमले हुए तो भगवान के भक्तों ने उनके विग्रह को गर्म कुंड में डाल दिया। लेकिन एकबार फिर आठवीं शताब्दी में जब दक्षिण से उत्तर में आदि शंकराचार्य पहुंचे तो उन्होंने भगवान का विग्रह नारायण कुंड से निकाला और फिर स्थापित किया, और मर्यादाएं स्थापित की, तब से भगवान बदरीनाथ की पूजा अर्चना और दर्शनों के लिए श्रद्धालु बदरीनाथ धाम पहुंच रहे हैं। इस मंदिर में दक्षिण के नंबूदरीबाद ब्राह्मण पूजारी की भूमिका निभाते हैं, जिन्हें रावल कहा जाता है, वहीं बदरीनाथ धाम में जो भगवान का विग्रह है वो स्वयंभू है। बदरीनाथ धाम को अलग-अलग काल में अलग-अलग नाम से जाना गया, सत्ययुग में बदरीनाथ धाम को मुक्ति प्रदा, त्रेता युग में योग सिद्धा, द्वापर में विशाला और कल्युग में बदरीकाश्रम और बदरीनाथ के नाम से जाना जाता है।

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