अध्यात्म

भगवान शिव की पूजा में भूलकर भी ना करें “शंख” का इस्तेमाल, यह है वजह

न्यूज़ट्रेंड वेब डेस्क: शिव शंभू, महादेव, शिव शंभू और ना जाने कितने नामों से जाने जाते हैं भगवाल शिव। स्वाभव में भोले स्वाभाव के कारण ही शिव भगवान को भोले बाबा कहा जाता है। हालांकि सिर्फ अपने भोलेपन के लिए ही नहीं बल्कि शिव भगवान अपने क्रोध के लिए भी जाने जाते हैं। ब्रह्माण्ड के कण-कण में बसें महादेव को प्रसन्न करना बहुत ही आसान होता है, लेकिन इसके बावजूद भी कुछ ऐसी बाते हैं जो शिव भगवान के पूजन के वक्त ध्यान देनी अति आवश्यक होती हैं। उनकी पूजा करते वक्त कुछ छोटे-मोटे नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है, अगर आप उन पर ध्यान नहीं देंगे तो आपको लेने के देने पड़ सकते हैं। तो चलिए आपको बताते हैं कि भगवान शिव की पूजा करते वक्त किन बातों का ध्यान रखें।

वैसे तो पूजा में शंख का विशेष महत्व होता है, लेकिन भगवान शिव की पूजा में शंख का इस्तेमाल करना वर्जित होता है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों भगवान शिव की पूजा में शंख का इस्तेमाल करने की मनाही है? तो चलिए अब जानते हैं इसके पीछे की वजह।

पूजा में शंख का इस्तेमाल ना करने की एक पौराणिक कथा है। शिवपुराण में इस कथा का वर्णन किया गया है। जिसमें बताया गया है कि किसी जमाने में शंखचूड नाम का एक पराक्रमी दैत्य हुआ करता था, वह दैत्यराज दंभ का पुत्र था। दैत्यरंज दंभ ने कई सालों तक भगवान विष्णु की कठिन तपस्या की जिसके बाद खुश होकर उसको भगवान विष्णु ने दर्शन दिए और वर मांगने को कहा, जिस पर उसने विष्णु भगवान से तीनों लोकों में अजेय और महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा। इतना ही नहीं दैत्यराज दंभ ने पुत्र ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और उनसे अजेय होने का वरदान भी हासिल किया।

इन दोनों वरदानों के बाद शंखचूड अत्यंत पराक्रमी हो गया और उसने अपने पराक्रम के बल पर तीनों लोकों पर अपना स्वामित्व स्थापित कर लिया। उसके अत्याचारों से तीनों लोक बुरी तरह से प्रभावित थे तीनों लोकों में हाहाकार मचा हुआ था, सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि देवता भी उसके अत्याचारों से काफी परेशान हो गए थे। शंखचूड के बढ़ते अत्याचारों से निजात पाने के लिए सभी लोग भगवान शिव के पास गए, लेकिन शिव जी उसका वध कर पाने में असमर्थ रहें क्योंकि उसे श्रीकृष्ण कवच और तुलसी की पतिव्रत धर्म की प्राप्ति थी, इन दोनों के होते हुए शंखचूड का वध करना असंभव था।

यह सब देखते हुए भगवान विष्णु ने एक उपाय निकाला और वह एक ब्राह्मण के भेष में शंखचूड के पास पहुंचे और उससे श्रीकृष्ण कवच दान में ले लिया। साथ ही शंखचूड़ का रूप धरकर तुलसी के शील का हरण भी कर लिया। जिसके बाद शंखचूड की सारी ताकतों को नाश हो गया और इसी बीच शिव जी ने शंखचूड़ को अपनी त्रिशूल से भस्म कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि शंखचूड़ की हड्डियों से ही शंख का जन्म हुआ था और यही वह वजह है कि शिव जी की पूजा में शंख का इस्तेमाल को वर्जित किया गया है।

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