हिंदू धर्म में अनेकों पौराणिक कथाएं मौजूद हैं. इन पौराणिक कथाओं में लगभग सभी देवी-देवताओं, राजा-महराजाओं और योद्धा-अप्सराओं का वर्णन मिलता है. आज हम आपको ऐसी ही एक पौराणिक कहानी के बारे में बताने जा रहे हैं. यह कहानी है उर्वशी और उसके पति पुरुरवा की. इस कहानी में सभी भाव देखने को मिलते हैं. यह कहानी प्यार, करुणा और ईर्ष्या से भरी हुई है. तो आईये जानते हैं इस कहानी के बारे में.

पुरुरवा एक चंद्रवंशी राजा हुआ करते थे. उनके पिता का नाम बुध और माता का नाम ईला था. बुध के माता-पिता का नाम सोम और बृहस्पति था. पुरुरवा अपने समय के महान योद्धा थे. स्वर्ग के देवता इंद्रदेव ने कई बार असुरों से युद्ध के दौरान पुरुरवा से सहायता मांगी थी. उर्वशी इंद्रदेव के दरबार की  एक खुबसूरत अप्सरा हुआ करती थी. वह स्वर्ग के ऐशों-आराम से ऊबकर कुछ समय धरती पर बिताने के लिए आ गई. इस दौरान उर्वशी को स्वर्गलोक से ज्यादा पृथ्वी का जीवन भाने लगा. पृथ्वीलोक की भावनाओं से भरी जिंदगी उसे अच्छी लगने लगी. लेकिन कुछ दिनों के बाद ही उर्वशी को वापस स्वर्गलोक भी लौटना था. धरती पर समय व्यतीत करने के बाद बाकी अप्सराओं के साथ वापस लौटने के दौरान एक राक्षस ने उसका अपहरण कर लिया. पुरुरवा की नज़र उस राक्षस पर पड़ी. उसने रथ से राक्षस का पीछा किया और उर्वशी को राक्षस से बचाया. यह पहली बार था जब किसी मानव ने उर्वशी को स्पर्श किया था. उर्वशी पुरूरवा की तरफ आकर्षित हो गई और पुरुरवा भी स्वर्ग की अप्सरा को अपना दिल दे बैठा.

दोनों का प्यार एक नाटक के दौरान चरम सीमा पर पहुंच गया. दरअसल, उर्वशी ने एक नाटक में भाग लिया. इस नाटक में वह मां लक्ष्मी का किरदार निभा रही थी. किरदार निभाते हुए उर्वशी ने अपनी प्रियतम के तौर पर भगवान विष्णु का नाम लेने की बजाय पुरुरवा का नाम ले लिया. यह देखकर नाटक को निर्देशित कर रहे भारत मुनि को गुस्सा आ गया. उन्होंने उर्वशी को श्राप देते हुए कहा कि एक मानव की तरफ आकर्षित होने के कारण उन्हें पृथ्वीलोक पर ही रहना पड़ेगा और मानवों की तरह संतान भी पैदा करने होंगे. इस श्राप से उर्वशी को ज़रा भी दुःख नहीं हुआ. पुरुरवा और उर्वशी एक-दूसरे की यादों में खोये रहने लगे. एक बार फिर उर्वशी पृथ्वीलोक आ पहुंची. दोनों एक-दूसरे से मिले और अपने प्यार का इज़हार किया.

दोनों ने साथ रहने का फैसला किया. लेकिन उर्वशी की कुछ शर्तें थीं. उर्वशी ने कहा कि पुरुरवा को उर्वशी की दो बकरियों की हमेशा सुरक्षा करनी होगी. दूसरी शर्त यह कि वह हमेशा घी का ही सेवन करेगी. तीसरी यह कि केवल शारीरिक संबंध बनाते वक़्त ही दोनों एक-दूसरे को निर्वस्त्र देख सकते हैं. पुरुरवा को उर्वशी की सारी शर्तें मंजूर थी. दोनों ने साथ रहना शुरू कर दिया. लेकिन उनके जीवन में दुखद मोड़ आना बाकी था.

 

स्वर्गलोक के देवताओं को पुरुरवा और उर्वशी का यह साथ पसंद नहीं आ रहा था. उन्हें उनके प्रेम से ईर्ष्या हो रही थी. उर्वशी के जाते ही स्वर्ग की रौनक भी चली गई थी. इसलिए स्वर्ग के देवताओं ने दोनों को अलग करने की योजना बनाई. एक रात उर्वशी की बकरियों को गांधर्वों ने चुरा लिया. बकरियों की आवाज़ सुनने पर उर्वशी ने पुरुरवा से उन्हें बचाने का आग्रह किया. उस समय पुरुरवा निर्वस्त्र थे. वह जल्दी-जल्दी में निर्वस्त्र ही बकरियों को बचाने के लिए निकल पड़े. इसी दौरान देवताओं ने स्वर्ग से बिजली चमका कर उजाला कर दिया और दोनों ने एक-दूसरे को निर्वस्त्र देख लिया.

इस शर्त के टूटते ही उर्वशी स्वर्गलोक के लिए रवाना हो गई. दोनों बेहद ही दुखी थे. हालांकि उर्वशी अपने साथ पुरुरवा और अपने बच्चे को ले गई. बाद में उसने अपने बच्चे को पुरुरवा को सौंपने के लिए कुरुक्षेत्र के निकट बुलाया. बाद में अनेकों घटनाक्रम की वजह से उर्वशी धरती पर आईं. इस दौरान दोनों के बहुत बच्चे हुए.

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