अध्यात्म

मिलिए सूर्यदेव की संतानों से, कोई देता है लम्बे जीवन का वरदान तो कोई छीन लेता है पल भर में जीवन

हिन्दू धर्म में कई देवी-देवता हैं। उन्ही में से हैं सूर्यदेव, जिनकी वजह से पृथ्वी पर जीवन संभव है। माना जाता है कि सूर्यदेव का परिवार काफी लम्बा है। सूर्यदेव की संज्ञा और छाया नाम की दो पत्नियाँ हैं और 10 संतानें हैं। यमराज और शनिदेव जैसे पुत्र और यमुना जैसी इनकी बेटियाँ काफी प्रचलित हैं। मनुस्मृति के रचयिता मनु भी सूर्यदेव की ही संतान हैं। उनकी पत्नी छाया के बारे में कहा जाता है कि पहली पत्नी संज्ञा सूर्य का तेज सहन ना कर पाने के कारण अपनी छाया को छोड़कर तप करने चली गयीं।

देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा थे सूर्यदेव के श्वसुर:

सूर्यदेव काफी समय तक छाया को ही अपनी पत्नी समझते रहे। काफी समय बाद इस रहस्य से पर्दा उठा। सूर्यदेव को संज्ञा से जुड़वाँ अश्विनी कुमार के साथ ही कुल छः संतानें हुई, जबकि छाया से चार संतान हुई हैं। देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा संज्ञा के पिता थे, इस वजह से वह सूर्यदेव के श्वसुर थे। उन्होंने ही सूर्यदेव को संज्ञा के तप पर जाने की जानकारी दी थी। जानिए सूर्यदेव के अजीबो-गरीब संतानों के बारे में।

सूर्यदेव की संतानें:

*- यम:

धर्मराज यानी यमराज सूर्यदेव के सबसे बड़े पुत्र हैं। यह संज्ञा की प्रथम संतान हैं।

*- यमी:

यमी यानी यमुना सूर्यदेव की दूसरी संतान एवं सबसे बड़ी पुत्री हैं। अपनी माता संज्ञा को सूर्यदेव से मिले आशीर्वाद की वजह से यह पृथ्वी पर नदी के रूप में प्रसिद्ध हुई हैं।

*- वैवस्वत मनु:

मनु सूर्यदेव की तीसरी संतान हैं। प्रलय के बाद पृथ्वी का पुनर्निर्माण करने वाले पहले पुरुष बने और इन्होने ही मनुस्मृति की रचना की है।

*- शनिदेव:

शनिदेव को सूर्यदेव और छाया की पहली संतान माना जाता है। इन्हें कर्म का देवता कहा जाता है। यह मनुष्य को उसके कर्मों के आधार पर फल देते हैं। इनके नाम से मनुष्य के साथ देवता भी डरते हैं।

*- ताप्ती:

छाया और सूर्य की कन्या तप्ति का विवाह सोमवंशी राजा संवरण के साथ हुआ। कुरुवंश के स्थापक राजर्षि कुरु इन दोनों की ही संतान थे, इन्ही से कौरवों की उत्पत्ति हुई थी।

*- विष्टि या भद्रा:

सूर्य और छाया की पुत्री विष्टि भद्रा नाम से नक्षत्र लोग में प्रविष्ट हुई। भद्रा काले रंग, लंबे बाल, बड़े-बड़े दांत तथा भयंकर रूप वाली कन्या है। भद्रा गधे के मुख और लंबे पूंछ और तीन पैरयुक्त उत्पन्न हुई। शनिदेव की तरह ही इसका स्वभाव भी कड़क है।

*- सावर्णि मनु:

इन्हें सूर्यदेव और छाया की चौथी संतान माना जाता है। वैवस्वत मनु की ही तरह वे इस मन्वन्तर के पश्चारत अगले यानि आठवें मन्वन्तर के अधिपति होंगे।

*- अश्विनी कुमार:

एक प्राचीन कथा के अनुसार संज्ञा के बारे में जानकारी मिलने के बाद अपना तेज कम करके सूर्यदेव घोड़ा बनकर उनके पास गए। संज्ञा उस समय अश्विनी यानि घोड़ी के रूप में थी। दोनों के संयोग से जुड़वां अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति हुई जो देवताओं के वैद्य हैं। कहते हैं कि दधीचि से मधु-विद्या सीखने के लिये उनके धड़ पर घोड़े का सिर रख दिया गया था, और तब उनसे मधुविद्या सीखी थी।

*- रेवंत:

इन्हें सूर्य की सबसे छोटी और संज्ञा की छठी संतान माना जाता है। रेवंत सूर्यदेव और संज्ञा के पुनर्मिलन के बाद जन्मे से। रेवंत हमेशा भगवान सूर्य की सेवा में लगे रहते हैं।

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