नई दिल्ली: हमारे समाज में सदियों से यह परम्परा चली आ रही है कि जब बाप की मौत हो जाती है तो परिवार का बड़ा बेटा या छोटा बेटा ही कन्धा दे सकता है। जिसके बेटे नहीं होते हैं उसको परिवार का कोई अन्य पुरुष ही कन्धा देता है लेकिन महिलाओं को इससे वंचित रखा जाता है। समाज धीरे-धीरे बदल रहा है। इसके साथ ही समाज के कुछ नियम भी बदल रहे हैं। इसका एक ताजा उदहारण अभी हाल ही में देखने को मिला है।

नजदीक जाकर देखा तो शादी नहीं बल्कि थी अंतिम यात्रा:

अक्सर आपने देखा होगा जब किसी की अंतिम यात्रा निकाली जाती है तो सभी के मुँह पर राम-नाम सत्य है का नारा और चेहरे पर उदासी होती है। लेकिन इस बार एक अलग ही नजारा देखने को मिला है। यहाँ सड़क पर बज रहे ढ़ोल-नगाड़े और बैंड-बाजे के संगीत पर थिरकती लड़कियां सज धजकर, मानों किसी की बारात निकाल रही हो। इसे देखने के लिए सड़क पर सैकड़ों लोगों का हुजूम इकठ्ठा हो गया। जब लोगों ने नजदीक जाकर देखा तो यह किसी की शादी नहीं बल्कि किसी की अंतिम यात्रा थी। चार लड़कियों ने अपने कंधे पर अर्थी उठा रखी थी।

अंतिम यात्रा को मनाया जाये उत्सव के रूप में:

सभी लोग यह नजारा देखकर हैरान हो गए। सब जानना चाहते थे कि आखिर यह अर्थी है किसकी। अंतिम यात्रा में शामिल लोगों ने हँसते हुए बताया कि यह नॉएडा के मशहूर कारोबारी हरी भाई लालवानी की अंतिम यात्रा है। उनकी यह आख़िरी इच्छा थी कि उनकी अंतिम यात्रा किसी शोकयात्रा की तरह नहीं बल्कि उत्सव के रूप में मनाई जानी चाहिए। उनका कोई बेटा नहीं है। इसलिए पत्नी मधु लालवानी के साथ चारों बेटियां अनिता लालवानी, दीप्ति लालवानी, रितिका लालवानी, यामिनी लालवानी पिता की अंतिम इच्छा को पूरा कर रही हैं।

पुरे शहर के सामने पेश की नई मिशाल:

हरी भाई की अंतिम उत्सव यात्रा को उनके निवास स्थान सेक्टर-40 से निकाल कर पहले पूरे सेक्टर में घुमाया गया। इसके बाद सेक्टर-94 स्थित अंतिम निवास स्थान पर ले जाया गया। यहां पर उनके अंतिम उत्सव में शामिल होने के लिए भारी हुजूम जमा था। नौ नवंबर की रात 12 बजे वह दुनिया छोड़ कर चले गए। हरी भाई बेटों और बेटियों में कोई अंतर नहीं समझते थे। उनकी बेटियों ने बेटे की तरह फर्ज निभाकर पूरे शहर के सामने एक नई मिसाल पेश की है। उन्होंने गम को जश्न में बदलकर दुनिया के सामने एक नया नजारा पेश किया।

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