सब से बड़ा रहस्य, जानिये कैसे हुयी थी किन्नरों की उत्पत्ति!

नमस्कार दोस्तों। आप में से लगभग सभी लोगों ने किन्नरों के बारे में तो सुना ही होगा। हर कोई किन्नरों के वास्तविक जीवन के बारे में जानना चाहता है। उनका रहन सहन, उनका वैयक्तिक जीवन, वगैरह। लेकिन सबसे बड़ी उत्सुकता तो इस बात को लेकर है कि किन्नरों की उतपत्ति आखिर कब और कैसे हुई, इसके पीछे क्या वजह थी। आइए इसी तथ्य पर सविस्तर चर्चा करते हैं। How kinner were first Born.

किन्नरों के उतपत्ति का रहस्य प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है :

किन्नरों के उतपत्ति का रहस्य प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। वास्तव में किन्नरों के दो प्रकार होते हैं, पहला प्रकार जिन्हें किन-पुरुष कहा जाता है, तथा दूसरा प्रकार जिन्हें किन-पुरुषी के नाम से जाना जाता है। बहुत पुरानी बात है जब प्रजापति कर्दम एक महान शासक हुआ करते थे। राज्य-परराज्य में उनके शौर्य की गाथा मशहूर थी। प्रजापति कर्दम के एक पुत्र थे जिनका नाम युवराज ईल था। राजा कर्दम के बाद युवराज ईल राज्य के उत्तराधिकारी बने। आगे चलकर वे एक महान धर्मात्मा राजा के नाम से प्रसिद्ध हुए।

राजा ईल को शिकार का बड़ा शौक था :

राजा ईल को शिकार का बड़ा शौक था। एक दिन वे अपने सैनिकों के साथ शिकार करने एक घने जंगल मे गए। काफी शिकार करने के बाद भी राजा ईल का मन नही भरा, और शिकार के मोह में भटकते भटकते वे एक पर्वत पर आ गए थे। उस पर्वत पर भगवान शिव और देवी पार्वती विहार कर रहे थे। देवी पार्वती को प्रसन्न करने हेतु भगवान शिव ने एक स्त्री का रूप धारण कर लिया था। शिवजी के स्त्री रूप धारण करते ही उस पर्वत पर मौजूद सारे पुल्लिंग जीव जंतु तुरंत स्त्रीलिंग में रूपांतरित हो गए थे।

सैनिकों के साथ साथ उनका भी रूपांतरण स्त्रीलिंग में हो गया :

चूंकि राजा ईल भी उसी समय उसी पर्वत पर मौजूद थे, अपने सैनिकों के साथ साथ उनका भी रूपांतरण स्त्रीलिंग में हो चुका था। खुद को स्त्री के रूप में देख राजा ईल काफी दुःखी हुए। जब उन्हें पता चला कि यह सबकुछ भगवान शिव की इच्छा से हुआ है, तब वे और भी भयभीत हो गए थे। राजा ईल शिवजी के चरणों मे जाकर गुहार लगाने लगे तथा पुनः पुरुष रूप प्रदान करने की इच्छा व्यक्त करने लगे। लेकिन शिवजी ने उनसे पुरुषत्व के अलावा और कोई भी वरदान मांगने की अनुमति दी, पर राजा ईल शिवजी के निर्णय के खिलाफ नही जा सके तथा उन्होंने दूसरा वरदान लेने से मना कर दिया। समस्त स्त्री सैनिकों के साथ राजा ईल भी देवी पार्वती को प्रसन्न करने में जुट गए।

पूरा पुरुषत्व प्रदान करने में असमर्थ रही :

देवी पार्वती राजा ईल से काफी प्रभावित हुई पर उन्हें पूरा पुरुषत्व प्रदान करने में असमर्थ रही। देवी पार्वती ने कहा कि वह उन्हें सिर्फ आधा पुरुषत्व ही दे सकती है, आधा पुरुषत्व देने का अधिकार सिर्फ शिवजी को ही है। देवी से आधा पुरुषत्व पाकर राजा ईल ने एक और वरदान मांगा जिसके चलते वे एक महीना स्त्री के रूप में तथा एक महीना पुरुष के रुप में जीवन व्यतीत करेंगे। देवी पार्वती ने यह कहकर तथास्तु कहा कि जिस एक महीने में तुम पुरुष के रूप में रहोगे, तुम्हे स्त्री के बारे में सबकुछ भूलना पड़ेगा और जिस एक महीने तुम स्त्री के रूप में रहोगे, तुम्हे पुरुष के बारे में सब कुछ भूल जाना पड़ेगा। राजा ईल ने यह बात खुशी खुशी स्वीकार कर ली तथा एक महीने वे पुरुष ईल के रूप में रहे और एक महीना स्त्री ईला के रूप में।

चूंकि उस वक्त राजा ईल के सैनिक जो स्त्री रूप में परिवर्तित हो चुके थे, वे सदैव के लिए स्त्री ही बन गए। आगे चलकर वे एक दिन चन्द्रमा के पुत्र बुद्ध के आश्रम पहुंचे। बुद्ध जी के आदेश से उन्होंने उसी पर्वत पर अपना निवास स्थान बना लिया था तथा अपने जीवन साथी के रूप में किनपुरुषों को ही चुन लिया था। किन्नरों के अतीत का पूरा रहस्य वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के उत्तर कांड में देखने को मिलती है।

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