भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. सबसे बड़े लोकतंत्र को अमली जामा चुनावों के माध्यम से पहनाया जाता है. भारत में चुनाव किसी राजनैतिक उत्सव से कम नहीं होते जो महीनों चलते हैं. लेकिन पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान बहुत सी चीजें ऐसी होती हैं जो कि न्यायसंगत नहीं होती है. कई चीजें न्यायसंगत होती हैं तो बहुत सी चीजें प्रैक्टिकल एप्रोच पर खरी नहीं उतरतीं.

 राजनैतिक पार्टियों के चुनावी वादों और घोषणा पत्रों का मुद्दा –

‘चुनावी मुद्दों के सन्दर्भ में आर्थिक सुधार’ के मुद्दे पर एक सेमिनार के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने राजनैतिक पार्टियों के चुनावी वादों और घोषणा पत्रों का मुद्दा उठाया उन्होंने कहा कि देश में चुनाव के दौरान किये गए राजनैतिक पार्टियों के वादे आमतौर पर पूरे नहीं होते, राजनैतिक पार्टियों के घोषणा पत्र सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाते हैं. उन्होंने कहा कि इसके लिए राजनैतिक पार्टियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए.

उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में राजनैतिक दल आम सहमती नहीं होने का बहाना बनाकर अपने वादे पूरे करने से बच जाते हैं जो कि न्यायोचित तो है मगर सही नहीं. प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर ने यह भी कहा कि नागरिकों की याददाश्त अल्पकालिक होती है. ऐसे में चुनावी घोषणा पत्र महज कागजी टुकड़े बनकर रह जाते हैं और राजनैतिक पार्टियां इनपर ध्यान नहीं देती हैं. उन्होंने घोषणा पत्र में किये गए वादों के लिए पार्टियों को जवाबदेह बनाये जाने की बात कही.

प्रधान न्यायाधीश ने साल 2014 के आम चुनावों के दौरान पार्टियों के घोषणा पत्रों पर सवाल उठाते हुए कहा कि उस समय किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में ऐसा कुछ भी नही था जिससे चुनाव सुधार, समाज के सीमान्त वर्ग के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय की सुनिश्चितता तय होती है. उन्होंने कहा कि घोषणा पत्रों में दिए वादे और संवैधानिक लक्ष्यों के बीच किसी तरह से संपर्क का संकेत ही नहीं था. प्रधान न्यायाधीश ने इसे रेवड़ियां बांटने जैसा माना है और कहा कि ऐसी घोषणाओं के खिलाफ चुनाव आयोग राजनैतिक दलों पर आचार संहिता उल्लंघन की कार्रवाई कर रहा है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही दिशा निर्देश जारी किये हैं.

सेमिनार में प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर के अलावा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश के बाद दूसरे वरिष्ठ जज के पद पर पदासीन न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा भी मौजूद थे.

न्यायमूर्ती दीपक मिश्रा ने भी चुनाव सुधारों का मुद्दा उठाया और कहा कि खरीदने की ताकत का चुनावों में कोई स्थान नहीं है, प्रत्याशियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि चुनाव लड़ना किसी प्रकार का निवेश नहीं हैं. उन्होंने चुनाव सुधारों पर प्रकाश डाला और जनता से अपराधमुक्त समाज बनाने के लिए वोट देने की अपील की.

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