आपने दुनिया के आठ अजूबों के बारे में सुना होगा, लेकिन आज मैं जिस अजूबे के बारे में बात कर रहा हूं उसके बारे में जानने के बाद आपके होश उड़ जायेंगे। आप ज्यादा सोचें इससे पहले ही मैं आपको बता देता हूं कि यह अजूबा कहीं और नहीं बल्कि भारत के मध्य प्रदेश में ही है। दरअसल हम जिस अजूबे की बात कर रहे हैं वह कुछ और नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के एक छोटे से गांव बुधेला का वीणा वादिनी पब्लिक स्कूल है। Wonder of the world.

दोनों हाथों से लिखने की कला में माहिर हैं बच्चे –

आप आप सोच रहे होंगे कि एक स्कूल 9वां अजूबा कैसे हो सकता है। सच्चाई जानने के बाद आप भी मान जायेंगे कि यह दुनिया का 9वां अजूबा ही है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस स्कूल के लगभग पौने 200 बच्चे ऐसे हैं जो दोनों हाथों से लिखने की कला में माहिर हैं। आपको फिल्म “थ्री इडियट” तो याद होगी ही? उस फिल्म में बोमन इरानी भी दोनों हाथों से लिखते हैं। ये बच्चे भी बिलकुल उन्ही की तरह दोनों हाथों से लिखने में माहिर हैं। लेकिन फर्क बस इतना है कि ये काबिल बच्चे दोनों हाथों से दो अलग-अलग भाषा में लिख सकते हैं।

कंप्यूटर से भी तेज रफ्तार में लिखते हैं बच्चे –

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये बच्चे कंप्यूटर से भी तेज रफ्तार में लिखने के माहिर हैं। ये बच्चे हिंदी, अंग्रेजी, स्पेनिश, उर्दू और रोमन जैसी 6 भाषाएं लिखने के माहिर हैं। ये दोनों हाथों से दो अलग-अलग भाषाओं में कोई भी चीज बड़ी आसानी से लिख लेते हैं। ये बच्चे 11 घंटे में दोनों हाथों से 24000 शब्द लिखने की क्षमता रखते हैं। आपको भी यकीन नहीं होगा कि पहाड़ों से घिरे इस अभावग्रस्त गांव में इतनी ज्यादा प्रतिभा कहां से आ गयी। यह पूरा इलाका कोयले का भण्डार है और यहां के लोग इसी से अपना गुजर-बसर करते हैं, ऐसे में इन बच्चों की अच्छी शिक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

इस स्कूल का एक बच्चा कर रहा है आईएएस की तैयारी –

इन बच्चों की लिखावट की रफ्तार देखने के बाद आप भी कहेंगे कि ये किसी कंप्यूटर से कम नहीं हैं। ये बच्चे मात्र 45 सेकेंड में उर्दू में गिनती लिखने के माहिर हैं। इसके साथ ही यह 1 मिनट में रोमन और एक मिनट में हिंदी में गिनती लिखने के माहिर हैं। यही नहीं ये होनहार बच्चे 1 मिनट में 250 शब्द का ट्रांसलेशन किसी दूसरी भाषा में करने के भी माहिर हैं। आपको बता दें वीणा वादिनी स्कूल में आस-पास के कई गांवों के बच्चे पढ़ते हैं और वे यहां से यह कला सीख रहे हैं। यहां पर बच्चों को 8वीं तक ही शिक्षा दी जाती है।

आपको जानकर काफी हैरानी होगी कि इस स्कूल में इतनी कम सुविधाएं होने के बावजूद यहां दिल्ली और मुंबई के बड़े स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से ज्यादा होनहार बच्चे हैं। इस स्कूल का एक बच्चा 8वीं तक यहां पढ़ने के बाद कहीं और से आगे की पढ़ाई पूरी कर इस समय दिल्ली में आईएएस की तैयारी कर रहा है।

वीरांगद सिंह ने शुरू किया था यह स्कूल –

इस स्कूल की शुरुआत के पीछे एक बड़ी ही दिलचस्प कहानी है। जबलपुर में आर्मी की ट्रेनिंग कर रहे बुधेला गांव के निवासी वीरांगद सिंह ने एक दिन रेलवे स्टेशन पर एक किताब में पढ़ा की डॉ. राजेंद्र प्रसाद दोनों हाथों से लिखने के माहिर थे। उन्होंने और खोजबीन की तो पता चला कि प्राचीन काल के नालंदा विश्वविद्याल में पढ़ने वाले बच्चे एक दिन में दोनों हाथों से 32,000 शब्द लिखने के माहिर थे। इसके बाद क्या था, वीरांगद ने इस काम को वर्तमान में कर दिखाने की ठान ली और लग गए अपने सपने को पूरा करने में, साल 1999 में उन्होंने इस स्कूल की स्थापना टीन शेड रखकर कर दी थी।

नौकरी छोड़ लग गए स्कूल के काम में –

उन्होंने आर्मी की नौकरी छोड़ दी और स्कूल के काम में ही लग गए। शुरुआत में उन्हें काफी मुश्किलें हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इस काम में गांववालों ने उनका भरपूर साथ दिया। लायंस क्लब के चेयरमैन जेनिस रोज 2004-05 में अपने कुछ दोस्तों के साथ इस गांव में आये थे। उन्होंने बच्चों की यह प्रतिभा देखी और मुग्ध रह गए। उन्होंने बच्चों को अपने साथ वाराणसी ले जाने का निर्णय किया। वहां एक कार्यक्रम के दौरान बच्चों ने अपना हुनर सबको दिखाया। इसके बाद जेनिस रोज ने यह कहा था कि भारत में यह 9वां अजूबा है।

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