विशेष

बेहतरीन कवि थे अटल बिहारी वाजपेयी, पहली पुण्यतिथि पर सुने उनकी आवाज़ में 3 फेमस कविताएं

भाजपा के वरिष्ठ नेता और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को गुजरे पूरा एक वर्ष हो चुका हैं. ऐसे में आज यानी 16 अगस्त शुक्रवार को अटलजी की पहली पुण्यतिथि हैं. ऐसे में उन्हें याद करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह सहित कई बड़े नेता उन्हें आज श्रृद्धांजली दे रहे हैं. भाजपा के ये सभी नेता उनके दिल्ली स्थित स्मृति स्थल ‘सदैव अटल’ पर आज एकत्रित हुए हैं. यहाँ सभी लोग अटलजी की याद में भावुक दिखाई दिए. उन्होंने एक एक कर अटलजी को अफ्ली पुण्यतिथि पर श्रृद्धांजली अर्पित की. आपकी जानकारी के लिए बता दे कि अटल बिहारी वाजपेयी का पिछले साल 16 अगस्त के दिन एक लंबी बीमार के चलते निधन हो गया.

वो अटल बिहारी ही थे जिसके कारण बीजेपी ने नई बुलंदियों ओ छुआ था.अटलजी पहली बार साल 1996 में प्राइम मिनिस्टर बने थे. हालाँकि तब उनकी गवर्नमेंट सिर्फ 13 दिनों ही चली थी. लेकिन वे इससे निराश नहीं हुए और प्रयत्न करते रहे. ऐसे में दूसरी बार उन्होंने प्रधानमंत्री बनने का मौका साल 1998 में मिला. तब उनकी सरकार 13 महीनो तक टिकी रही. इसके बाद 1999 में जब वे तीसरी दफा पीएम बने तो पुरे 5 सालों तक उनकी सरकार बनी रही थी. 2004 में स्वास्थ संबंधी समस्याओं के चलते उन्होंने राजनीति से संस्यास ले लिया था. 2014 में अटलजी को देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ भी मिला था.

वे एक अच्छे इंसान और बेहतरीन राजनेता होने के साथ साथ एक शानदार कवी भी थे. अटलजी की कविताएं ताए लिखने का बड़ा शौक था. वे सिर्फ इन्हें लिखते ही नहीं थे बल्कि मंच पर पढ़ा भी करते थे. उनकी कई कविताएं बेहद लोकप्रिय हुई. इनमे से उनका कविता संग्रह ‘मेरी इक्वावन कविताएं’ बहुत पॉपुलर बुक रही. ऐसे में आज हम आपको अटलजी की लिखी कुछ ख़ास और चुनिंदा कविताएं सुनाने जा रहे हैं.

पहली कविता – ‘अमर आग’

दूसरी कविता – ‘मौत से ठन गई’

तीसरी कविता – ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा’

अटल बिहारी वाजपेयी की कुछ और फेमस कविताएं

1: कदम मिलाकर चलना होगा

बाधाएं आती हैं आएं

घिरें प्रलय की घोर घटाएं,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,

निज हाथों में हंसते-हंसते,

आग लगाकर जलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

हास्य-रूदन में, तूफानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

2. दो अनुभूतियां

-पहली अनुभूति

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं

टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं

गीत नहीं गाता हूं

लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं

गीत नहीं गाता हूं

पीठ मे छुरी सा चांद, राहू गया रेखा फांद

मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं

गीत नहीं गाता हूं

-दूसरी अनुभूति

गीत नया गाता हूं

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर

पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर

झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात

प्राची में अरुणिम की रेख देख पता हूं

गीत नया गाता हूं

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी

अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी

हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं

गीत नया गाता हूं.

3. एक बरस बीत गया

झुलासाता जेठ मास

शरद चांदनी उदास

सिसकी भरते सावन का

अंतर्घट रीत गया

एक बरस बीत गया

सीकचों मे सिमटा जग

किंतु विकल प्राण विहग

धरती से अम्बर तक

गूंज मुक्ति गीत गया

एक बरस बीत गया

पथ निहारते नयन

गिनते दिन पल छिन

लौट कभी आएगा

मन का जो मीत गया

एक बरस बीत गया.

Back to top button