अध्यात्म

ऋषि ऋष्यश्रृंग की रहस्यमय कहानी जिसने जिंदगी में किसी स्त्री को नहीं देखा!

भारत देश का इतिहास एतिहासिक और पौराणिक कहनियों से भरा हुआ है. इन कहानियों में बहुत सी ऐसी कहानियां हैं जो सुनने वाले को हैरान कर दे. जिन चमत्कारों और वरदानों की बात पुराणों में की गई है,उन्हें सुनकर यही लगता है कि क्या वाकई ऐसा हो सकता है ?

आज हम आपको एक ऐसी ही कहनी बताने जा रहे हैं जिसे पढ़कर आप चकित हो जाएगें और यह सोचने पर मजबूर हो जाएगें कि क्या वाकई ऐसा संभव था?

यह कहानी है ऋष्यश्रृंग की :

यह कहानी एक ऐसे ऋषि की है जिसने अपने जीवन में कभी भी किसी स्त्री को देखा ही नहीं था और जब देखा तो उनका वो अनुभव बेहद अलग और अजीब था. यह कहानी है ऋष्यश्रृंग की जिन्होंने अपने जीवनकाल में लिंगभेद जैसी कोई भी चीज महसूस नहीं की.

लिंगभेद न महसूस करने की वजह से वह कभी स्त्री और पुरुष में अंतर नहीं कर पाए, उनके लिए जिस तरह पुरुष उनके गुरु भाई थे उसी प्रकार स्त्रियां भी उनके लिए गुरु भाई थीं.

ऋष्यश्रृंग विभांडक ऋषि के पुत्र थे :

ऋष्यश्रृंग कश्यप ऋषि के पौत्र और विभांडक ऋषि के पुत्र थे. पुराणों के अनुसार, विभांडक ऋषि के कठोर तप से देवता कांप उठे थे और उनकी समाधि तोड़ने के लिए उन्होंने स्वर्ग से उर्वशी को उन्हें मोहित करने के लिए भेजा.

 

उर्वशी के कारण विभांडक ऋषि की तपस्या टूट गई :

उर्वशी के मनमोहक और आकर्षक स्वरूप के कारण विभांडक ऋषि की तपस्या टूट गई. दोनों के संसर्ग से ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ.

 उर्वशी स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गई :

पुत्र को जन्म देते ही उर्वशी का काम पृथ्वी पर समाप्त हो गया और वे अपने पुत्र ऋष्यश्रृंग को विभांडक ऋषि के पास छोड़कर वापस स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गई.

उर्वशी के इस छल ने विभांडक ऋषि को बहुत आहत किया और उन्होंने समस्त नारी जाति को ही इसके लिए दोषी ठहराना शुरू कर दिया.

 

पुत्र को लेकर विभांडक ऋषि एक जंगल में चले गए :

अपने पुत्र को लेकर विभांडक ऋषि एक जंगल में चले गए और उन्होंने यह निश्चय किया कि वे अपने पुत्र ऋष्यश्रृंग पर किसी भी स्त्री की छाया तक नहीं पड़ने देंगे.

जिस जंगल में वो तप करने गए थे वह जंगल अंगदेश की सीमा से लगा हुआ था. विभांडक ऋषि के घोर तप और क्रोध के कारण अंगदेश में अकाल के बादल छा गए, लोग भूख से बिलखने लगे.

विभांडक ऋषि के कोप का परिणाम :

इस समस्या के समाधान के लिए अंगदेश राजा रोमपाद ने अपने मंत्रियों, ऋषि-मुनियों को बुलाया. ऋषियों ने राजा से कहा कि यह सब विभांडक ऋषि के कोप का परिणाम है.

अगर वह किसी भी तरह उनके पुत्र ऋष्यश्रृंग को जंगल से बाहर निकालकर अपने नगर में लाने में सक्षम हो जाते हैं तो उन्हें अकाल से मुक्ति मिल सकती है.

जबकि अपने जीवनकाल में ऋष्यश्रृंग ने कभी किसी स्त्री को नहीं देखा था इसलिए उन्हें आकर्षित कर पाना आसान नहीं था.

राजा ने इसके लिए भी योजना बनाई . उन्होंने अपने नगर की सभी देवदासियों को ऋष्यश्रृंग को आकर्षित कर उन्हें जंगल से बाहर निकालकर नगर लाने का काम सौंप दिया.

 

गुरुभाई’ मानकर ऋष्यश्रृंग उनके पास चले गए :

एक दिन जब ऋष्यश्रृंग जंगल में विचरण के लिए निकले तब उन्होंने एक आश्रम में खूबसूरत देवदासियों को देखा. वे बेहद आकर्षक और सुन्दर थीं, उन्हें अपना ‘गुरुभाई’ मानकर ऋष्यश्रृंग उनके पास चले गए.

देवदासियों ने उन्हें आकर्षित कर यौन आनंद के लिए प्रेरित करने का सिलसिला शुरू किया. अगले दिन ऋष्यश्रृंग उन देवदासियों को ढूंढ़ते हुए उनके आश्रम में जा पहुंचे.

देवदासियों को लगने लगा कि उनका कार्य लगभग पूरा हो गया है। देवदासियों ने ऋषि से कहा कि वह उनके साथ नगर की ओर चलें. ऋष्यश्रृंग ने उनकी बात मान ली और उनके साथ नगर की ओर प्रस्थान कर गए.

ऋष्यश्रृंग के राजा रोमपाद के दरबार पहुंच गए :

ऋष्यश्रृंग के राजा रोमपाद के दरबार पहुंचने पर राजा ने उन्हें सारी घटना बताई कि उनके पिता ऋषि विभांडक के तप को तोड़ने के लिए यह सब किया गया था.

अपने पुत्र के साथ हुए इस छल से विभांडक ऋषि अत्यंत क्रोधित हुए और क्रोध के आवेश में आकर रोमपाद के महल पहुंचे. जहां विभांडक ऋषि का क्रोध शांत करने के लिए रोमपाद ने अपनी दत्तक पुत्री शांता का विवाह ऋष्यश्रृंग से कर दिया था.

 

 

अयोध्या के राजा दशरथ :

अयोध्या के राजा दशरथ ने जब पुत्र प्राप्ति के लिए अश्वमेध यज्ञ करवाने का निश्चय किया तब सुमंत ने उन्हें विष्णु के अवतार संत कुमार द्वारा राजा पूर्वाकल को ऋषियों की कही एक कहानी सुनाई जो ऋष्यश्रृंग से ही जुड़ी हुई थी.

दशरथ के घर भगवान राम का जन्म:

इस घटना के होने से कई वर्ष पहले ही संतकुमार ने राजा पूर्वाकल से कहा था कि महर्षि विभांडक को एक महान पुत्र की प्राप्ति होगी जिनके द्वारा किए गए पुत्रप्राप्ति के यज्ञ से ही दशरथ के घर भगवान राम का जन्म होगा.

हैरान करने वाली बात ये है कि राजा रोमपाद ने ऋष्यश्रृंग से अपनी जिस दत्तक पुत्री का विवाह किया था वह राजा दशरथ की पुत्री और भगवान श्रीराम की बहन थी.

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