अपनी पहचान छिपाकर रहने वाले गुमनामी बाबा ही थे सुभाष चंद्र बोस, अमेरिकी एक्सपर्ट का दावा सालों से सबके मन में ये सवाल था कि क्या गुमनामी बाबा ही सुभष चंद्र बोस थे, एक एक्पर्ट ने हैरानी वाला खुलासा किया है.

देश के बड़े क्रांतिकारी पॉलीटिकल लीडर सुभाष चंद्र बोस ने अपने नेतृत्व में स्वतंत्रा सेनानियों ने अंग्रेजों से लोहा लेने का हौसला दिखाया था. सुभाष चंद्र बोस को नेताजी कहकर भी संबोधित किया जाता था. ऐसा बताया जाता है कि विदेश से भारत आते समय इनका प्लेन क्रैश हो गया और आजादी के दो साल पहले ही उनका निधन हो गया था लेकिन बहुत से लोग ये भी कहते हैं कि उनके मरने के निशान नहीं मिले थे और वे जिंदा रहे होगे. जो भी है मगर उसके बाद से नेताजी के बारे में कोई भी सुराग नहीं मिल पाया था लेकिन पिछले कुछ सालों से लोगों का कहना था कि अपनी पहचान छिपाकर रहने वाले गुमनामी बाबा ही थे सुभाष चंद्र बोस, मगर इस बात में कितना दम है इसके पुख्ते सबूत नहीं मिल पाए फिर भी एक एक्सप्रट ने ऐसा दावा किया है.

अपनी पहचान छिपाकर रहने वाले गुमनामी बाबा ही थे सुभाष चंद्र बोस

इस कहानी की असली शुरुआत साल सिंतंबर, 1985 में हुई जब अयोध्या शहर के सिविल लाइंस स्थित राम भवन में गुमनामी बाबा या भगवान जी की मौत हो गयी थी. गुमनामी बाबा की मौत के दो दिन बाद बड़े ही गोपनीय तरीके से इनका अंतिम संस्कार किया गया था. उनके मरने के बाद कुछ लोगों ने उनके कमरे से सामान बरामद किया और तो कोई कहने लगा कि ये कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे बल्कि ये सुभाष चंद्र बोस थे. अयोध्या में गुमनामी बाबा जिन-जिन जगहों पर रहे वहां पर उनके रहने का तरीका बेहद गुप्त रहा है. वहां के लोग मानते हैं कि गुमनामी बाबा इस इलाके में करीब 15 सालों तक रहे. साल 1970 में ये बाबा फैजाबाद पहुंचे और इसके बाद अयोध्या की लाकोठी में किराएदार रूप में रहते थे और इसके बाद कुछ समय उत्तर प्रदेश के बस्ती में भी बिताया था. मगर यहां पर लंबे समय तक उनका मन नहीं लगा और वे फिर से अयोध्या लौट गए थे.

आपको बता दें कि गुमनामी बाबा जिस राम भवन में रहते थे उसके मालिक शक्ति सिंह का कहना था कि शहर के चिकित्सिक डॉ. आरपी मिश्र के जरिए गुमनामी बाबा का संपर्क पूरे नगर मजिस्ट्रेट और दादा ठाकुर गुरुदत्त सिंह के साथ था. इसके बाद पूरी गोपनीय तरीके से रात में वे राम भवन में उस हिस्से में शिफ्ट हो गए जिसमे वे आराम से रहते थे. शक्ति सिंह का कहना है कि उनसे मिलने बहुत कम लोग आते थे और कुछ तो रात में भी आ जाते थे और सुबह को जाते थे. उनके नाम से चिट्ठियां भी आती थी और गुमनामी बाबा ज्यादातर लोगों से पर्दे के पीछे रहकर ही बात करते थे. गुमनामी बाबा को अंग्रेजी, जर्मन, बांग्ला सहित कई भाषाएं आती थी. इनकी मौत के बाद सुभाष चंद्र बोस होने के सारे गुण मिलते हैं.

अमेरिकी एक्सपर्ट ने किया है दावा

अभी तक इसके पुख्ते सबूत तो नहीं मिले हैं कि गुमनाबी बाबा ही सुभाष चंद्र बोस थे लेकिन एक नई किताब ने ये दावा किया है कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चंद्र बोस थे. इस किताब ने दावा किया है कि अमेरिका के एक हैंडराइटिंग एक्पर्ट ने सुभाष चंद्र बोस और गुमनामी बाबा की हैंडराइटिंग की जांच की और इसका नतीजा ये पाता कि ये हैंडराइटिंग एक ही आदमी की है. उनके कमरे में सुभाष चंद्र बोस के कुछ दस्तावेज भी मिले हैं जिसमें उनके परिवार की पुरानी तस्वीरें भी शामिल हैं. इसके मुताबिक ऐसा दावा किया गया है कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चंद् बोस थे. अमेरिकी एक्सपर्ट कार्ल बैग्गेट ने दस्तावेजों की जांच करने के बाद रिपोर्ट दी जिसपर उन्होंने हस्ताक्षर भी किए थे और इस रिपोर्ट में कार्ल ने लिखा कि गुमनामी बाबा और नेताजी सुभाष चंद्र बोस कोई दो शख्स नहीं बल्कि एक ही थे.