जब एक जहरीला सांप अर्जुन से बदला लेने के लिए बैठ गया था कर्ण के तीर पर, जानिए पूरी कथा

हिंदू धर्म में महाभारत का विशेष महत्व है. कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध को आज भी संसार भुला नहीं पाया है. बता दें कि युद्ध की शुरुआत उस समय हुई थी, जब पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी का चीरहरण होने वाला था. इन पांच पांडवों में से अर्जुन सबसे शक्तिवान था. अर्जुन अपने निशाने की माहिरता के लिए जाना जाता था. वहीँ कुंती का एक एक अन्य पुत्र भी था जिसे उसने पैदा होते ही नदी में बहा दिया था. लेकिन कुदरत के करिश्मे ने इस पुत्र को बचा लिया. जिसके बाद उस बालक का नाम कर्ण रखा गया. कर्ण को हस्तिनापुर के अधिरथ और उसकी पत्नी राधा द्वारा पाला गया था इसलिए आज लोग कर्ण को राधेय के नाम से भी जानते हैं. कर्ण को भगवान इंद्र ने एक ऐसा अमोघास्त्र  दिया था जोकि एक ही वार से किसी को ख़तम कर सकता था.

ऐसे में जब कुंती माँ को कर्ण के उस शस्त्र के बारे में पता चला तो वह  कर्ण से पांडवों की ओर से लड़ने का आग्रह लेकर उसके पास पहुँच गई.  कर्ण यह बात जानता था कि कुंती ही उसकी माँ है लेकिन इसके बावजूद भी उसने कुंती की बात मानने से साफ़ इनकार कर दिया. कर्ण ने कहा कि वह बचपन से जिन कौरवों के साथ खेल कूद के बड़ा हुआ है, आज उनके विश्वास को तोड़ नही सकता. ऐसे में जब कुंती ने उससे पुछा कि “क्या तुम अपने ही भाइयों को मारोगे?” तो जवाब में कर्ण ने माँ से वादा किया कि वह अपने चार भाइयों पर हाथ नहीं उठाएगा लेकिन अर्जुन को वह नही छोड़ेगा.

लोक कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान जब कर्ण ने अर्जुन पर तीर चला कर हमला करने का प्रयास किया तो कर्ण के तुणीर में कहीं से एक ज़हरीला सर्प आकर बैठ गया. जब तरकश से कर्ण ने तीर निकालना चाहा तो वह सांप उसके हाथ आ गया. कर्ण ने उस सर्प से पुछा कि वह कौन है और कहाँ से आया है. इस बार पर ज़हरीले सर्प ने जवाब दिया कि हे, दानवीर कर्ण मैं अर्जुन से बदला लेना चाहता था इसलिए मै आपके तुणीर में जा बैठा था. मेरा और आपका उद्देश्य एक ही था इसलिए मैं इसका भागीदार बनने आया था.

जब कर्ण ने सर्प से उसके बदले का कारण पुछा तो सर्प ने बताया कि अर्जुन ने कुछ समय पहले खांडव वन में आग लगा दी थी जिनमे उस सर्प की माँ जल कर मर गई थी. तब से वह सर्प अर्जुन के प्रति विद्रोह में था और प्रतिशोध लेने का अवसर ढूँढ रहा था. जोकि आज उसे कर्ण के रूप में मिला. सर्प ने कर्ण से कहा कि वह उसे तीर की तरह साध कर अर्जुन की तरफ चला दे और वह कुछ ही क्षणों में अर्जुन को काट कर उसके प्राण पखेरू छीन लेगा. इस बात को सहजता से लेते हुए कर्ण ने कहा कि अर्जुन ने अगर वन में आग लगाई थी तो उसका उदेश्य सर्प की माता को जलाना हरगिज़ नहीं होगा. ऐसे में वह अर्जुन को दोषी नहीं मानता और बिना अपराध के सर्प को अर्जुन के प्राण नही लेने दे सकता. कर्ण के आग्रह करने पर वह सर्प वहां से उड़ गया.