पेड़ के पीछे से राम ने किया था बालि का वध, जानें बालि ने कैसे लिया अपना बदला

रामायण में सीता को खोजने निकले प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण की कई लोगों से हुई मुलाकात का जिक्र सुनने को मिलता है। इसी दौरान प्रभु श्री राम सुग्रीव से मिले थे और उसके बड़े भाई को मार कर उसकी पत्नी उसे वापस दी थी। सुग्रीव का बड़ा भाई बालि था जो किष्किंधा का राजा था।  बालि का विवाह वानर वैद्याराज सुषेण की पुत्री तारा के साथ हुआ था जो की एक अप्सरा थी।  बालि का वध श्रीराम ने किया था यह बात तो हम सभी जानते हैं, लेकिन बालि ने अपने वध का बदला श्रीराम सेस लिया था इस बात की जानकारी बहुत ही कम लोगों को होगी।

बालि के पास था स्वर्ण हार

वानर राज बालि बहुत ही शक्तिशाली था और से परास्त करना आसान नहीं था।  उसके पिता वानरश्रेष्ठ ऋक्ष थे। बालि का एक पुत्र भी था जिसका नाम अंगद था। बालि बहुत ही प्रतापी और शक्तिशाली था साथ ही वह गदा और मल्ल युद्ध में पारंगत था। उसके अंदर उड़ने की शक्ति थी इस वजह से उसे बहुत ही शक्तिशाली माना जाता था।

बालि को उसे धर्मपिता इंद्र ने एक स्वर्ण हार दिया था। इस हार की शक्ति यह थी की इसे पहनकर जब भी बालि किसी से लड़ाई करता तो सामने वाली की शक्ति आधी हो जाती थी और बालि के अंदर सामने वाले की ताकत चली जाती थी। इस कारण से बहुत से राजा बालि से हार चुके थे। यहां तक की रावण को भी बालि ने अपनी कांख में दबाकर रखा था और उससे जीतना नामुमकिन था।

पेड़ के पीछे से की बालि का वध

बालि ने अपने छोटे भाई की पत्नी को जबरदस्ती अपने पास कैद कर रखा था और बलपूर्वक सुग्रीव को अपने राज्य से बेदखल कर दिया था। जब श्रीराम सुग्रीव से मिले तो उन्होंने अपना कष्ट प्रभु को बताया था।  साथ ही उसकी ताकत भी बता दी थी ऐसे में श्रीराम सामने से बालि को नहीं मार सकते थे।

इसके बाद छल करते हुए प्रभु श्रीराम मे पेड़ के पीछे से बालि का वध किया था।। बालि की मृत्यु तो हो गई थी, लेकिन हमेशा से इस बात का बैर रहा था की प्रभु ने उसे पीछे से मारा। इसका बदला लेने के लिए बालि हमेशा तड़पता रहा। इलके बाद जब प्रभु श्रीराम ने कृष्ण का अवतार लिया तो बालि ने जरा नाम के बहेलिये के रुप मे जन्म लिया था। जब महाभारत के युद्ध के बाद श्रीकृष्ण पेड़ के नीचे लेटे थे तो जहर के तीर से बहेलिये ने उन्हे हिरण समझकर मार दिया था।

बालि ने लिया बदला

दरअसल श्रीकृष्ण ने द्वारिका में अपना निवास स्थान बनाया था और सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र में उन्होंने अपना देह त्याग दिया था। उन्हें गांधारी ने श्राप दिया था कि जैसे मेरे कुल का पतन हो गया वैसे ही एक दिन तुम्हारे कुल का पतन हो जाएगा। उनके श्राप के कार उनका कुल नष्ट हो दा था। श्रीकृष्ण इसके बाद से बहुत दुख रहने लगे थे। एक बार वह पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे जब बहेलिये ने उन्हें हिरण समझकर तीर मार दिया था। इसके साथ ही उन्होंने समाज में संदेश दिया की जो जिसके जैसा करता है अंत में उसे वैसी ही प्राप्त होता है।

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