अगर आप भी चाहते हैं कि आपके जीवन के सारे अमंगल दूर हों तो भगवान शंकर की इस आरती का जाप करें!

भगवन शंकर को तो आप जानते ही हैं कि वो कितने दयालु हैं और जब वो क्रोधित हो जाते हैं तो किसी की नहीं सुनते हैं और सर्वनाश कर देते हैं। सोमवार का दिन भगवन शंकर का दिन कहा जाता है, जो भी भक्त उनको प्रसन्न करना चाहते हैं, वह सोमवार के दिन उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। भगवन शंकर को बहुत नामों से जाना जाता है। भोले भंडारी, महादेव, उन्हें इसीलिए कहा जाता है कि इन्हें देवताओं में सबसे ज्यादा पूजा जाता है और यह अपने भक्तों के सारे दुखों को पल भर में हर लेते हैं।

आदिकाल से हो रही है पूजा:

आपको बता दें भगवन शिव की पूजा आदिकाल से की जा रही है। इनको खुश करने के कुछ उपाय शिव महापुराण में भी बताये गए हैं। कुछ उपाय तो इतने आसन हैं कि उन्हें कोई भी कर सकता है और अपने जीवन के सारे कष्टों को दूर कर सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि भगवन शंकर ही एक ऐसे देवता हैं, जिन्हें दुनियाँ के अन्य देशों में भी पूजा जाता है।

भाँग धतुरा से खुश होते हैं भगवन शंकर:

अगर आप भी भगवान शंकर को खुश करना चाहते हैं तो आप भाँग, धतुरा, दूध, मदार, गंगाजल और भस्म से पूजा कर सकते हैं। इसके अलावा आप भगवन शंकर की इस आरती को पढ़कर उनको प्रसन्न कर सकते हैं। ऐसा करने से आपके जीवन के सरे अमंगल दूर हो जायेंगे और आपके जीवन में खुशियों की बारिश होगी। जानिए उनके आरती मन्त्र के बारे में।

इस मन्त्र से करें आरती:

शिवजी की आरती करें जाप
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

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