बेटे की अंतिम यात्रा में बाप ने बजवाए बैंड बाजे, बेटियों ने दिया मुखाग्नि, वजह है चौकाने वाली

अंतिम यात्रा में बाप ने बजवाए बैंड बाजे: सही कहा गया है कि जीवन और मृत्यु का कोई भरोसा नहीं है। आज जो व्यक्ति हंस-खेल रहा है क्या पता अगले ही पल उसके प्राण पखेरू उड़ जाए। इस पृथ्वी पर पैदा हुए हर व्यक्ति को एक ना एक दिन इस दुनिया को छोड़कर दूसरी दुनिया में जाना ही है। लोग जाने के बाद किसी भी व्यक्ति को उसके कामों की वजह से याद करते हैं। किसी भी व्यक्ति की मौत के बाद उसकी अंतिम यात्रा निकाली जाती है। कुछ लोग इस यात्रा को शोक के साथ निकालते हैं, जबकि कुछ लोग अंतिम यात्रा को शादी की तरह निकालते हैं।

बेटियों ने दी अपने पिता को मुखाग्नि:

हाल ही में एक ऐसा ही बैरन करने वाला नज़ारा गुजरात के वडोदरा में देखने को मिला है। जी हाँ यहाँ हार्ट अटैक से मृत्यु हो जाने के बाद एक व्यक्ति की बैंड-बाजे के साथ धूम-धाम से अंतिम यात्रा निकाली गयी। बैंड वालों ने रघुपति राघव राजा राम सहित अनेक भजन बजाए। आपको बता दें अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार का यह क्रम लगभग 40 मिनट तक चलता रहा। इस पूरे यात्रा का वीडियो भी शूट किया गया और शादियों की तरह जमकर आतिशबाज़ी भी की गयी। करोडिया गाँव के रहने वाले 39 वर्षीय भरत परमार को बेटियों ने मुखाग्नि दी।

हमें उसके लिए है बहुत गर्व:

जानकारी के लिए आपको बता दें तीन मार्च को उनकी मृत्यु हो गयी थी। जवान बेटे की असमय मृत्यु हो जाने के बाद भी इस तरह अंतिम संस्कार करने पर भरत के पिता गोरधन परमार ने बताया कि, मेरे बेटे भरत ने परिवार के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया था और ख़ुद को क़ुर्बान कर दिया। एक-एक दिन में वह 10-11 ऑर्डर पूरे करता था। उसने बहुत पैसा और नाम कमाया। इस वजह से हमें उसके लिए भी बहुत कुछ करना था। परिवार को सुखी और समृद्धशाली बनाने के लिए भरत आज हमसे बहुत दूर चले गए हैं। लेकिन उन्होंने परिवार के लिए जो कुछ भी किया है, उसके लिए हमें बहुत गर्व है।

मैंने ऊँट पर बैठकर निकाली थी बारात:

भरत के पिता ने बताया कि इसी वजह से हमनें अपने बेटे की अंतिम यात्रा बैंड-बाजे के साथ निकाली। ऐसा करके हमने श्रेय-कृतज्ञता देने का नया चलन शुरू किया है। भरत की पत्नी और बेटियों की सहमति के बाद ही हमने इस तरह का क़दम उठाया था। आपको बता दें भरत के पिता गोरधनभाई परमार वयोवृद्ध हैं। उन्होंने बताया कि मुझे शुरू से ही कुछ अलग करने की प्रेरणा होती रहती है। ऐसा करना पसंद रहा है। उन्होंने बताया कि हमारे समय में ज़्यादा सम्पन्न लोग घोड़े पर सवार होकर शादी करने जाते थे। मैंने ऊँट पर बैठकर बारात निकाली थी।

हमें भी नहीं है उनके जानें का शोक:

अपने गाँव में ऐसा करने वाला में अकेला था। बेटे के मुंडन में भी बैंड-बजा मंगवाने वाले हम अकेले व्यक्ति थे। हमारे दादा-चाचा के 12 भाई और 72 लोगों का परिवार है। भरत की बेटी ने कहा कि मेरे पिता मुझे अपना बेटा मानते थे। वह मुझसे हमेशा कहते रहते थे कि तुम मेरी बेटी नहीं बल्कि बेटा हो। हम तीन बहने हैं। मेरे पिताजी हमेशा हँसते रहते थे। इसी वजह से हमें भी उनके जाने का शोक नहीं है। हमने अपने पिता की अंतिम इच्छा के अनुसार ही उनका अंतिम संस्कार किया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.