गंदे कपड़े पहनने से मिलता है ये अशुभ फल, जानिए गरूण पुराण की महत्वपूर्ण बातें

सनातन धर्म मे शास्त्रों और पुराणों का विशेष महत्व है.. शास्त्र मनुष्य को जीवन जीने का उचित मार्ग बताते हैं.. ऐसे में हजारों वर्षों पहले लिखे गए ये शास्त्र आज भी मानव जीवन के लिए उतने ही उपयोगी हैं और इनमे बताए गए तथ्यों का अगर पालन किया जाए तो इंसान का जीवन बेहतर और सफल हो सकता है। आज हम आपको गरूण पुराण में बताई गई ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में रहे हैं।

गरुण पुराण की बात करें तो ये  वेदव्यास जी द्वारा रचित 18 पुराणो में से एक है। इसमें 279 अध्याय और 18000 श्र्लोक हैं। वैसे तो इस ग्रंथ में मृत्यु के बाद की घटनाओं, प्रेत-लोक, यम-लोक, नरक और 84 लाख योनियों के जीवन आदि के बारे में बताया गया है। लेकिन इसके अलावा भी गरूण पुराण में कई सारी मानव उपयोगी बातें लिखी गई हैं।जैसे कि..

गंदे वस्त्र पहनने से आती है दरिद्रता

गरूण पुराण के अनुसार अगर कोई धन और सुख-सुविधाओं से संपन्न होने के बावजूद भी गंदे या बहुत अधिक इस्तेमाल किए हुए कपड़े पहनता है तो उससे सारे सुख छिन सकते हैं। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि ऐसे लोगों से देवी लक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं। असल में मां लक्ष्मी साफ-सुंदर और सुगंधित स्थान पर ही निवास करती हैं। इसलिए अगर आप मां लक्ष्मी की कृपा चाहते हैं तो आपको अपने वस्त्रों की सफाई के साथ व्यक्तिगत सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

अभ्यास के बिना कला कुंठित हो जाती है

साथ ही गरुड़ पुराण की माने तो किसी भी कला या विद्या को अर्जित करने के बाद अगर अभ्यास नहीं किया जाए तो वो कुछ समय के बाद कुंठित हो जाती है इसलिए ज्ञान के साथ उसका अभ्यास करना भी आवश्यक माना जाता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जो लोग अपनी कला या विद्या पर घमंड कर दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं तो उनसे सरस्वती मां विद्या छिन लेती हैं।

इन दस लोगों के यहां कभी भोजन ना करें

वही गरुड़ पुराण के अनुसार हमें दस तरह के लोगों के यहां कभी भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। गरूण पुराण की माने तो अगर हम इन लोगों की दी गई खाने की चीज को ग्रहण करते हैं या इनके घर में भोजन करते हैं तो इससे पाप के भागी बनते हैं। ये दस लोग हैं चोर, सूदखोर, चुगलखोर, नशेड़ी, क्रोधी, निर्दयी, नपुंसक,रोगी व्यक्ति, चरित्रहीन स्त्री और निरंकुश राजा ।

दरअसल गरूण पुराण में कहा गया है कि आप जैसा अन्न खाते हैं वैसी ही आपका मन यानी चरित्र हो जाता है  ऐसे में अगर आप इस तरह के दस व्यक्तियों के यहां भोजन ग्रहण करते हैं तो आपके भीतर भी इनके जैसे अवगुण आ सकते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत में मिलता है जब युद्ध में घायल होकर तीरों की शैय्या पर पड़े भीष्म पितामह से द्रोपदी पूंछती है- “आखिर आपने भरी सभा में मेरे चीरहरण का विरोध क्यों नहीं किया जबकि आप तो सबसे बड़े और सबसे सशक्त थे।” तब भीष्म पितामह ने द्रोपदी से कहा थी कि मनुष्य जैसा अन्न खाता है उसका मन भी वैसा ही हो जाता है। मै, अधर्मी कौरवों का अन्न खा रहा था इसलिए मेरा भी मन-मस्तिष्क वैसा ही हो गया .. ऐसे में मुझे उस जधन्य कृत्य में भी उस वक्त कुछ गलत नज़र नहीं आया। यही वजह है कि गरूण पुराण में दस तरह के अधर्मी लोगों को घर भोजन से बचने की सलाह दी गई है।

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