“हिंदी दिवस” – क्या अंग्रेजी ने छिनी हिन्दी की पहचान? जानिए क्यों बढ़ रहा “हिंगलिश” का चलन……

आज हिंदी दिवस है और सरकारी आयोजनों से लेकर सोशल मीडिया पर सिर्फ हिंदुस्तानी ही नहीं हिंदी बोलने वाला विश्व का हर आदमी गर्व महसूस कर रहा है। लेकिन फिर भी हिन्दी भाषा उपेक्षा की शिकार है और अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही है। हिंदी भाषा कि उपेक्षा का कारण ना जाने क्या है? शायद प्रगतिशील समाज के चलते ऐसा हो।


हिन्दी का इतिहास –

हिंदी दुनिया में सबसे तेजी से लोकप्रिय हो रही भाषा है और इंटरनेट पर भी इसकी मांग पिछले कुछ सालों में अंग्रेजी की तुलना में 5 गुना तेजी से बढ़ी है।  हिन्दी का इतिहास भारत के इतिहास के जैसे ही समृद्ध रहा है।

 

  • संस्कृत से निकली एक भाषा है लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि हिंदी का पहली बार इस्तेमाल कब और किसने किया था। आपको बता दें कि हिंदी को अपना नाम फारसी शब्द ‘हिंद’ से मिला है। हिंद का अर्थ ‘नदियों का देश’ है।

 

  • पहले ‘अपभ्रंश’ के नाम से जाना जाता था और 400 AD में कालजयी कवि कालिदास ने इसका इस्तेमाल करना शुरू किया था। उन्होंने अपभ्रंश का इस्तेमाल कर नाटक ‘विक्रमोर्यवशियम्’ लिखा था।

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  • कुछ लोग मानते हैं कि हिंदी सिर्फ भारत की और उसमें भी सिर्फ उत्तर भारत की भाषा है। ऐसे लोगों को बताना चाहते हैं कि भारत के अलावा हिंदी को मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, त्रिनिदाद एंड टोबेगो और नेपाल में भी बोली जाती है। दुनिया में करीब 500 मिलियन लोग हिंदी बोलते हैं। हिंदी सिर्फ मंदारिन और अंग्रेजी से ही पीछे है जबकि स्पेनिश से उनकी रेस चलती रहती है।

 

  • 14 सितंबर को ही हिंदी दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को राजकीय भाषा का दर्जा दिया था। हालांकि अभी तक भी हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया है और राजभाषा के बतौर भी हिंदी और अंग्रेजी दोनों का ही इस्तेमाल किया जाता है।

 

  • इसके लिए कई राजभाषा आयोग का भी गठन किया गया लेकिन दक्षिण भारत और कई अन्य राज्यों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने पर विरोध दर्ज कराया है। हालांकि साल 1965 में हिंदी को अधिकारिक भाषा का दर्जा दे दिया गया है।

 

आज लोग हिंदी नहीं “हिंगलिश” बोलते हैं –

लोग आज हिंदी की जगह हिंगलिश बोलते हैं। आप अपने चारों ओर नजर घुमा कर देखिये आपको पता लग जायेगा कि हम सही है। केवल आम जिंदगी ही नहीं हमारे मनोरंजन के साधनों में भी हिंगलिश का बोल-बाला है।

मसलन फिल्मों को ही ले लीजिये, द डर्टी पिक्चर, काईटस, रॉकस्टार, नो वन किल्ड जेसिका, वांटेड, रेडी, बॉडीगार्ड, रा वन, हिरोईन, इश्क इन पेरिश तमाम ऐसे उदाहरण हैं जो आपको बता देंगे कि आज लोग हिंदी की जगह हिंदी-इंगलिश मिला कर बोलते हैं।

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जिंदगी की दौड़ में हिंदी बहुत पिछड़ती जा रही है जब तक इंसान ग्लोबल भाषा अंग्रेजी के साथ नहीं चलेगा वो तरक्की नहीं करेगा जिसके चलते आज मां-बाप अपने बच्चों को अंग्रजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए लालायित रहते हैं। ताकि जिन समस्याओं से दो-चार वो हो रहे हैं उन चीजों से उनके बच्चे ना हो। उनके बच्चों को सफल जीवन मिले जो कि अंग्रेजी से मिलेगा ना कि हिंदी से।

 

मीडिया भी नहीं देती तवज्जो –

यही नहीं आज जागरूकता अभियान के तहत भी हिंदी को लेकर कहीं बातें नहीं होती हैं, जहां होती हैं उसे हमारे मीडिया वाले वाले कवर नहीं करते हैं। चाहें तो आप खुद देख लीजिये। हिंदी दिवस के मौके पर केवल डीडी न्यूज को छोड़कर कौन सा चैनल आपको कोई कार्यक्रम दिखा रहा होगा।

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हिन्दी पर देश-दुनिया के जाने माने हस्तियों की ये रही है राय –

  1. जिस भाषा में तुलसीदास ने कविता की वह पवित्र है, उसके सामने कोई भाषा नहीं ठहर सकती. महात्मा गांधी

 

  1. हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है. – स्वामी दयानंद सरस्वती

 

  1. हिन्दी एक जानदार भाषा है. वह जितनी बढ़ेगी, देश का उतना ही नाम होगा. – जवाहर लाल नेहरू

 

  1. हिंदी भाषा को गंगा नहीं बल्कि समुद्र बनना होगा. – आचार्य विनोबा भावे

 

  1. हिंदी, ‘आम बोलचाल की महाभाषा’ है. – जार्ज ग्रियर्सन (भाषा-विज्ञानी)

 

  1. हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है. – मौलाना हसरत मोहानी

 

  1. इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है. – राजा राममोहन राय

 

  1. हम सबके दिलों को जोड़ने वाली भाषा है. – अमिताभ बच्चन

 

  1. हिंदी की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में जो ऐक्यबंधन संस्थापन करने में समर्थ होंगे वही सच्चे भारतबंधु पुकारे जाने योग्य हैं. – बंकिम चंद्र चटर्जी

 

  1. हिंदी जानने वाला आदमी सम्पूर्ण भारतवर्ष में यात्रा कर सकता है. भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए. – एनी बेसेंट

 

  1. हम प्रत्येक भारतीय के नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, तो हमें राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी भाषा को स्वीकार करना चाहिए. – रवीन्द्रनाथ टैगोर

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