एक रसगुल्ले के लिए लड़ गईं ममता बैनर्जी, जीत के बाद लंदन से किया ट्वीट

अपने कड़क मिजाज और अड़ियल रवैये के लिए जाने जानी वाली ममता बैनर्जी ने एकबार फिर सुर्खियों में हैं, क्योंकि इस बार उन्होनें अपने इसी रवैये के चलते बड़ी जीत हासिल की है। कहने के लिए तो ये जीत एक रसगुल्ला की है, लेकिन उस जीत से उनके साथ पूरे पश्चिम बंगाल में खुशी की लहर है। दरअसल ममता बैनर्जी और ओडिशा सरकार की रसगुल्ला को लेकर खींचतान चल रही थी। रसगुल्ला पर दोनों राज्य काफी दिनों से आमने सामने थे। इसमें पश्चिम बंगाल आखिरकार जीत गया।

लंदन से ममता बनर्जी ने दी जीत की जानकारी

ममता ने मंगलवार को ट्वीट कर कहा कि हम सभी के लिए मीठी खबर है। हम खुशी और गर्व के साथ यह कहना चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल में सर्वप्रथम रसगुल्ले के ईजाद होने का भौगोलिक पहचान टैग (जीआइ टैग) मिल गया है और रसगुल्ले के ईजाद पर हमारा अधिकार सिद्ध हो गया है। अब इसके पेटेंट की तैयारी है। इसके बाद से ही पश्चिम बंगाल में रसगुल्ला प्रेमी से लेकर नेता तक अपनी खुशी का इजहार करने लगे। दोनों राज्यों के बीच विवाद इस बात को लेकर था कि रसगुल्ले का ईजाद कहां हुआ है। इसकी जानकारी खुद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लंदन से ट्विटर पर दी।

ये थी विवाद की वजह

यह मामला उस वक्त सुर्खियों में आया, जब 2015 में ओडिशा के विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री प्रदीप कुमार पाणिग्रही ने दावा किया कि रसगुल्ले का ईजाद ओडिशा में हुआ है। उन्होंने इस दावे को सिद्ध करने के लिए भगवान जगन्नाथ के खीर मोहन प्रसाद को भी जोड़ा था। इस पर पश्चिम बंगाल के खाद्य प्रसंस्करण मंत्री अब्दुर्रज्जाक मोल्ला ने कहा था कि रसगुल्ले का ईजाद पश्चिम बंगाल में ही हुआ है और हम ओडिशा को इसका क्रेडिट नहीं लेने देंगे। दोनों राज्य सरकारें इस मामले को लेकर कोर्ट तक जाने को तैयारी में थीं।

ओडिशा सरकार व इतिहासकार के तर्क

ओडिशा के विज्ञान व तकनीकी मंत्री प्रदीप कुमार पाणिग्रही ने 2015 में मीडिया के समक्ष दावा किया कि 600 वर्ष पहले से राज्य में रसगुल्ला मौजूद है। उन्होंने इसका आधार बताते हुए इसे भगवान जगन्नाथ के भोग खीर मोहन से भी जोड़ा। वहीं इतिहासकार असित मोहंती का कहना था कि भगवान जगन्नाथ द्वारा मां लक्ष्मी को रथयात्र के समापन के समय रसगुल्ला भेंट करने की परंपरा 300 साल पुरानी है। पश्चिम बंगाल तो खुद ही मान रहा था कि उसका रसगुल्ला 150 साल पुराना है।

ये हैं रसोगुल्ला के कोलंबस

पश्चिम बंगाल सरकार ने रसगुल्ला या रसोगुल्ला को अपना बताने के लिए ऐतिहासिक साक्ष्य जुटाने में केसी दास प्राइवेट लिमिटेड की मदद ली। यह मिठाई की दुकानों की चेन है जो नवीन चंद्र दास के वंशजों द्वारा संचालित की जा रही है। पश्चिम बंगाल की तरफ से जवाब देने के लिए विस्तृत डोजियर तैयार किया गया था। इसमें मुख्य रूप से तीन तर्क दिए गए। इसमें कहा गया है कि छेना से रसगुल्ला बना, छेना बंगाल में ही अस्तित्व में आया। साथ ही रसगुल्ला शब्द बांग्ला भाषा का है। नवीन चंद्र के परपोते अनिमिख ने कहा कि रसगुल्ला के बारे में यह कहना कि 700 साल पहले ओडिशा में इसकी खोज हुई, गलत है। बंगाल में 18वीं सदी के दौरान डच और पुर्तगाली उपनिवेशवादियों ने छेना से मिठाई बनाने की तरकीब सिखाई।

जीआइ का क्या था मसला

2010 में एक मैगजीन के लिए करवाए गए सर्वे में रसगुल्ला को राष्ट्रीय मिठाई के रूप में पेश किया गया था। ओडिशा सरकार ने रसगुल्ला की भौगोलिक पहचान यानी जीआइ के लिए कदम उठा दिया। उसने दावा किया कि मिठाई का ताल्लुक उसी से है। पश्चिम बंगाल ने इसका विरोध किया। जीआइ वह आधिकारिक तरीका है जो किसी वस्तु के उद्गम स्थल के बारे में बताता है। ओडिशा का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्रलय रसगुल्ला को राज्य की भौगोलिक पहचान से जोड़ने में लगा हुआ था। दस्तावेज इकट्ठा किए गए थे, जिससे साबित हो कि पहला रसगुल्ला भुवनेश्वर और कटक के बीच अस्तित्व में आया था। वहीं पश्चिम बंगाल ने इन सभी दावों का तोड़ ढूंढ निकाला और आखिर में रसगुल्ले पर उसका कब्जा हो गया।

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