आज इस मंत्र से करें माँ दुर्गा के कालरात्रि रूप का पूजन, जीवन में आयेंगे मंगल ही मंगल

आज शारदीय नवरात्री की सप्तमी पड़ रही है, आज के दिन माँ दुर्गा के विराट रूप यानी कालरात्रि की पूजा की जाती है। कालरात्रि देवी का शनिग्रह पर आधिपत्य है। माँ कालरात्रि का यह रूप उस वृद्ध महिला और पुरुष के स्वरुप को प्रेरित है जो पौत्रादि का सुख लेते हुए काल से लड़ रहा है। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार माता दुर्गा का यह कालरात्रि रूप अत्यंत ही भयंकर है। माँ का यह रूप केवल पापियों के सर्वनाश के लिए है।

माता करती हैं भक्तों की हर मनोकामना की पूर्ति:

आज से देश के हर कोनें में दुर्गा पूजा की धूम देखी जा सकती है। कई जगहों पर नवरात्री के प्रथम दिन से ही माँ दुर्गा की स्थापना कर दी जाती है, जबकि कई जगहों पर पंचमी या छ्ष्ठामी के दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना की जाती है। पुरे देश में माँ की पूजा बड़े धूम-धाम से की जाती है। माँ दुर्गा अपने सभी भक्तों के हर मनोकामना की पूर्ति करती है। जो भी माँ दुर्गा की सच्चे मन से आराधना करता है, जीवन में उसे किसी भी चीज की कमी नहीं होती है।

जोड़े रखा है श्रृष्टि को एक दुसरे से:

माता के इस स्वरुप को शुभंकरी भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की पूजा करता है, वह समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। अगर पौराणिक मतों को मानें तो कालरात्रि ही महामाया व भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं। देवी कालरात्रि के बारे में यह भी कहा जाता है कि इन्होनें ही श्रृष्टि को एक दुसरे से जोड़े रखा है। कालरात्रि का अर्थ होता है काल की रात्रि यानी मृत्यु का अंत या काल का अस्त होना।

शास्त्रों में देवी के इस रूप का वर्णन काजल के रंग के समान अन्धकार की भांति कालिमा लिए हुए है। माता त्रिनेत्री हैं और इनके शरीर से बिजली की तरह किरणें निकलती रहती हैं। गले में विद्युत माला और हवा में लहराते बाल किसी भी पापी के मन में खौफ पैदा कर देता हैमाता गधे से सवार होकर अपनी उपरी दाई भुजा से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं, निचली दाई भुजा से अभय का आशीर्वाद देती हैं। बायीं भुजा में तलवार और खड्ग धारण की हुई हैं।

कालरात्रि की साधना से मिलता है जीवन में धनलाभ:

कालपुरुष सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति की कुंडली में शनिग्रह का सम्बन्ध दशम और एकादश भाव से होता है। देवी की साधना का सम्बन्ध कर्म, प्रोफेशन, पितृ, पिता, आय, लाभ, नौकरी आदि से होता है। वास्तुपुरुष सिद्धांत के अनुसार देवी की दिशा पक्षिम है। यह स्थान शयनकक्ष और भण्डार का होता है। देवी की साधना करनें वाले व्यक्ति की ग्रह बाधा दूर हो जाती है। व्यक्ति का कर्मक्षेत्र मजबूत होता है और आलस्य दूर होता है। इससे पदोन्नति और धनलाभ होता है। देवी की साधना उन लोगों के लिए फायदेमंद होती है जिनका सम्बन्ध कंस्ट्रक्शन, मैकेनिकल, इंजीनियरिंग, हार्डवेयर और पशुपालन से होता है।

देवी की साधना करते समय करें इस मंत्र का पाठ:

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

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