नवरात्री का पवन समय चल रहा है। आज नवरात्री चौथा दिन है। आज के दिन माँ दुर्गा के कुष्मांडा रूप की पूजा अर्चना की जाती है। माता कुष्मांडा का अधिपत्य सूर्य ग्रह पर है। ऐसा कहा जाता है कि देवी कुष्मांडा का स्वरुप उस विवाहित स्त्री और पुरुष को संबोधित करता है, जिसके गर्भ में नया जीवन पल रहा होता है, अर्थात जो स्त्री गर्भावस्था में है। वीर मुद्रा में सिंह पर सवार माँ का यह रूप सभी को अपनी तरफ आकर्षित करता है।

कुष्मांडा देवी की आराधना से हो जाती है हर मुराद पूरी:

हिन्दू धर्मशास्त्रों में कुष्मांडा देवी के रूप को प्रज्वलित प्रभाकर कहा गया है, जिसे चमकते सूर्य की भाँती भी समझा जाता है। आप नवरात्री के इस पवन समय में जगह-जगह माँ के सजे हुए दरबार देख सकते हैं। उन दरबारों में भारी संख्या में पुरुष एवं महिलाएं अपने मन की मुराद मांगनें की लिए जा रहे हैं। माता हर किसी की पुकार को तुरंत सुनते हुए, उनकी हर इच्छा को पूरी कर देती हैं। नवरात्री के समय की गयी माता की विशेष पूजा से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

माता की ही कृपा से है जीवो में तेज:

शास्त्रों में वर्णित है कि माता कुष्मांडा का नुवास सूर्यमंडल के मध्य में स्थित है। ब्रह्माण्ड के हर जीव में जो तेज है, वह माता की ही कृपा से है। शास्त्रों में देवी कुष्मांडा को अष्ठभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। माता के हाथ में कमल, कमंडल, अमृतपूर्ण कलश, धनुष, बाण, चक्र, गदा, कमलगट्टे की जापमाला है। देवी कुष्मांडा पुरे श्रृष्टि में अपने ज्ञान का प्रकाश फैलानें वाली हैं। यह प्राणियों को सिद्धियों और निधियों को प्रदान करनें का काम करती हैं।

देवी कुष्मांडा की आराधना का सम्बन्ध है सूर्य देव से:

देवी कुष्मांडा की साधना का सम्बन्ध सूर्य ग्रह से माना जाता है। कलुरुष सिद्धांत के अनुसार देखा जाये तो व्यक्ति की कुंडली में सूर्य का सम्बन्ध लग्न पंचम और नौवें घर से होता है। इसलिए यहाँ कहा जाता है कि देवी कुष्मांडा की साधना करनें से सेहत, मानसिकता, व्यक्तित्व, रूप, विद्या, प्रेम, उदर, भाग्य, गर्भाशय, अंडकोष और प्रजननतंत्र सम्बन्धी समस्याओं का समाधान होता है। वास्तुपुरुष सिद्धांत के अनुसार देवी कुष्मांडा की साधना का सम्बन्ध अदित्य अर्थात भगवान सूर्य से है, जिनकी दिशा पूर्व है।

सूजी के हलवे का लगायें माँ को भोग:

इनका निवास घर में बने अतिथि कक्ष की तरफ होता है। एसअ माना जाता है जब यह संसार खाली था उस समय माता ने ही ब्रह्माण्ड की संरचना की थी। देवी कुष्मांडा को श्रृष्टि की अदिस्वरूपा, आदिशक्ति कहा गया है। माता की पूजा लाल फूलों से करनी चाहिए। माता को श्रृंगार के लिए रक्त चन्दन अर्पित करें और प्रसाद के रूप में सूजी के हलवे का भोग लगायें। ऐसा माना जाता है कि माता की आराधना करनें से निसंतनों को संतान की प्राप्ति होती है। इसके अलावा उन लोगों को भी काफी फायदा होता है, जिनका पेशा राजनीती और प्रशासन होता है।

मंत्र:

‘ॐ कुष्मांडा देव्यै नमः’ इस मंत्र का 108 बार जाप करें।

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