इस बार हरतालिका तीज व्रत में समय का रखें विशेष ध्यान अखंड सौभाग्य के लिए इस शुभ मुहूर्त में करें विधि-विधान से पूजा..

सुख वैभव, संतान और सौभाग्य को प्रदान करने वाला हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है और इस वर्ष ये 24 अगस्त को मनाया जा रहा है। लेकिन इस बार एक ही दिन तृतीया और चतुर्थी पड़ने के कारण इस बार समय का विशेष ध्यान रखना है …. इसलिए निर्धारित समय के अन्दर ही पूजा करनी है … जानिए किस विशेष समय-मुहूत में और कैसे करनी है पूजा..

शुभ मुहूर्त

रात:काल हरतालिका तीज: सुबह 5 बजकर 45 मिनट से सुबह 8 बजकर 18 मिनट तक

प्रदोषकाल हरतालिका तीज: शाम 6 बजकर 30 मिनट से रात 8 बजकर 27 मिनट तक

तृतीया तिथि 23 अगस्त रात 9 बजकर 3 मिनट से 24 अगस्त को रात 8 बजकर 17 मिनट तक रहेगी। 24 अगस्त को तृतीया तिथि दिन भर रहेगी इस कारण हरतालिका तीज का व्रत 24 अगस्त को ही मनाया जाएगा, लेकिन व्रत करने वाली महिलाओं को 8 :27 से पहले पूजन अर्चन तथा कथा श्रवण करना होगा। कथा श्रवण के लिए शुभ मूर्हत 4:14 से 6:21 तक रहेगा। खास बात यह है कि हरतालिका व्रत में 24 अगस्त को भद्रा मुक्त है। इसलिए जो महिलाएं या युवतियां इस व्रत को पहली बार भी करना चाहती है वह कर सकती है।

हरतालिका तीज विधि

हरतालिका व्रत निर्जला किया जाता हैं, अर्थात पूरा दिन एवं रात अगले सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं किया जाता |हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता इसे हर वर्ष पूरे नियमों के साथ करना होता है। हरतालिका व्रत जिस घर में भी होता हैं.. वहाँ इस पूजा का खंडन नहीं किया जा सकता अर्थात इसे एक परम्परा के रूप में प्रति वर्ष किया जाता हैं…सामान्यतह महिलायें यह हरतालिका पूजन मंदिर में करती हैं |

हरतालिका पूजन सामग्री

  • गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत, केले का पत्ता, सभी प्रकार के फल एवं फूल पत्ते, बैल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, अकाँव का फूल, तुलसी, मंजरी,जनैव, नाडा, वस्त्र,
  • माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामान जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, माहौर, मेहँदी आदि मान्यतानुसार एकत्र की जाती हैं|
  • घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, श्री फल, कलश |
  • पञ्चअमृत- घी, दही, शक्कर, दूध, शहद |

 

हरतालिका तीज पूजन विधी

  • हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं.. प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय |
  • पूजन के लिए शिव, पार्वती एवं गणेश जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से हाथों से बनाई जाती हैं |
  • फुलेरा बनाकर उसे सजाया जाता हैं,उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर पटा अथवा चौकी रखी जाती हैं ..चौकी पर एक सातिया बनाकर उस पर थाल रखते हैं.. उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं |
  • तीनो प्रतिमा को केले के पत्ते पर आसीत किया जाता हैं |
  • सर्वप्रथम कलश बनाया जाता हैं जिसमे एक लौटा अथवा घड़ा लेते हैं ..उसके उपर श्रीफल रखते हैं अथवा एक दीपक जलाकर रखते हैं..घड़े के मुंह पर लाल नाडा बाँधते हैं और घड़े पर सातिया बनाकर उस पर अक्षत चढ़ाया जाता हैं |
  • कलश का पूजन किया जाता हैं और जल चढ़ाते हैं, नाडा बाँधते हैं.. कुमकुम, हल्दी चावल चढ़ाते हैं फिर पुष्प चढ़ाते हैं |
  • कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं |
  • उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं
  • उसके बाद माता गौरी की पूजा की जाती हैं और उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं |
  • इसके बाद हरतालिका की कथा पढ़ी जाती हैं |
  • फिर सभी मिलकर आरती की जाती हैं जिसमे सर्प्रथम गणेश जी कि आरती फिर शिव जी की आरती फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं |
  • पूजा के बाद भगवान् की परिक्रमा की जाती हैं |
  • रात भर जागकर पांच पूजा एवं आरती की जाती हैं |
  • सुबह आखरी पूजा के बाद माता गौरा को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं | उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं |
  • ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं, उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं |
  • अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं |

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