हिन्दू धर्म में ब्रह्मा जी को इस श्रृष्टि के रचयिता की संज्ञा दी जाती है। भगवान ब्रह्मा का एक सर कैसे कटा, इसके बारे में प्राचीन कथा है। आज हम आपको उसी कथा के बारे में बताने जा रहे हैं। यह बात श्रृष्टि की रचना के पहले की है, शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर बहस छिड़ गयी। दोनों ही खुद को सबसे बड़ा सिद्ध करने की कोशिश में लगे हुए थे।

जो बताएगा आदि और अंत के बारे में वही होगा सबसे बड़ा:

दोनों में से सबसे बड़ा कौन है, इस बात को लेकर बहस होने लगी। दोनों के बीच हो रहे इस विवाद का फैसला करने के लिए परमेश्वर को साक्षी बनाया गया। उसी समय अचानक से भगवान शंकर की माया से ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ और आकाशवाणी हुई कि ब्रह्मा और विष्णु में से जो भी इस ज्योतिर्लिंग के आदि और अंत के बारे में बता देगा वही सबसे बड़ा होगा। ब्रह्मा जी ज्योतिर्लिंग को पकड़कर उसके आदि का पता लगाने में लग गए और विष्णु जी अंत का पता लगाने की कोशिश में लग गए।

इस वजह से दोनों विपरीत दिशा में निकल पड़ेकाफी देर तक भ्रमण करने के बाद भी छोर ना मिलने की वजह से ज्योतिर्लिंग के आदि और अंत का पता नहीं चल सका। भगवान विष्णु और ब्रह्मा असफल होकर लौट आये। भगवान विष्णु ने कहा कि मैं ज्योतिर्लिंग का अंत नहीं जान पाया हूँ। अचानक से ब्रह्मा जी की नजर उनके साथ निचे आ रहे केतकी फूल की तरफ गयी। उन्होंने केतकी फूल को बहला-फुसलाकर अपने पक्ष में झूठ बोलने के लिए तैयार कर लिया।

भगवान शंकर ने काट दिया ब्रह्मा का पांचवा सर:

ब्रह्मा जी भगवान शंकर के पास जा पहुँचे। उन्होंने भगवान शंकर से कहा कि मुझे ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के बारे में सबकुछ पता चल गया है। ब्रह्मा जी ने खुद को सच साबित करने के लिए केतकी फूल से गवाही भी दिलवाई। भगवान शंकर को ब्रह्मा जी के झूठ के बारे में पता चल गया। ब्रह्मा जी की इस हारकत से भगवान शंकर क्रोधित हो गए। उन्होंने गुस्से में अपना त्रिशूल उठाया और उनका पांचवा सर काट दिया।

ब्रह्मा जी पाँच मुख से चार मुख वाले हो गए। इसके बाद ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान शंकर की प्रार्थना की और क्षमा माँगा। भगवान शंकर ने कहा कि, मैं ही इस श्रृष्टि का कारण, उत्तप्तिकर्ता और स्वामी हूँ। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है। ब्रह्मा जी के पक्ष में केतकी फूल यानी केवड़ा ने झूठ बोला था, और ब्रह्मा जी के झूठ में बराबर का भागी था। इसलिए भगवान शंकर ने केतकी के फूल को अपनी पूजा में वर्जित कर दिया। आज भी शिव पूजा में केतकी का फूल नहीं चढ़ाया जाता है।

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