सावन के महीने में भगवान शिव की कांवड़ क्यों लाते है लोग, जानिए इसके पीछे का पूरा सच…

अब सावन का महीना चल रहा है। हर तरफ भगवान शिव की पूजा हो रही है। हिन्दू धर्म में सावन के महीने का अपना अलग ही महत्व है। इस महीने को बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। इस माह का प्रत्येक दिन एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है। विशेष तौर पर इस महीने में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। लोग सावन माह में कावंड यात्रा करते है। दरअसल, कांवड़ शिव की आराधना का ही एक रूप है। इस यात्रा के जरिए जो शिव की आराधना कर लेता है। उस व्यक्ति से खुश होकर भगवान शिव उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी करते है। क्या आप जानते है लोग कांवड़ क्यों लाते है। आज आप को इसी के बारे में बताते है ..

कांवड़ यात्रा का महत्व :

सावन में लोग लंबी पैदल यात्रा करके कांवड लाते है। इसका बहुत बडा महत्व है। भगवान शिवजी को खुश करने के लिए लोग अलग-अलग तरीकों से उनकी पूजा करते हैं। इन्हीं तरीकों में से एक है कांवड़ लाना। सावन के महीने में भगवान भोलेनाथ के भक्त केसरिया रंग के कपड़े पहनकर कांवड़ लाते हैं, इसमें गंगा जल होता है। हर उम्र के बच्चे, युवा, व बूढ़े कांवड यात्रा में हिस्सा लेते है। कांवड लाने से व्यक्ति के सभी दुख दुर होते है।

कांवड़ यात्रा के नियम :

शिव भक्त सावन में रिमझिम बारिश में भी मस्ती के साथ झूमते-गाते कांवड लाते है। यह यात्रा काफी बड़ी होती है जिसमें पूरे भारत भर से लोग हिस्सा लेते है। पर क्या आप जानते हैं कावड़ यात्रा के भी कुछ नियम होते हैं। जैसे की कांवड हमेशा नंगे पांव पैदल चलकर ही लाई जाती है। कांवडिये यात्रा के दौरान किसी प्रकार का व्यसन नहीं करते हैं। और सबसे बडी बात कांवड को किसी भी स्थिति में जमीन पर नहीं रख सकते। कांवड हिन्दू लोगों की आस्था का प्रतीक है। रास्ते में जगह-जगह कांवडियों के लिए शिविर भी लगायें जाते है।

कांवड़ लाने के पीछे पौराणिक महत्व :

कांवड़ को सावन के महीने में लाया जाता है। दरअसल इसके पीछे एक पौराणिक कथा जुडी है। बताते है की, इस महीने में समुद्र मंथन के दौरान विष निकला था, दुनिया को बचाने के लिए भगवान शिव ने इस विष को पी लिया था। विष का सेवन करने के कारण भगवान शिव का शरीर जलने लगा। भगवान शिव के शरीर को जलता देख देवताओं ने उन पर जल अर्पित करना शुरू कर दिया। जल अर्पित करने के कारण भगवान शिवजी का शरीर ठंडा हो गया और उन्हें विष से राहत मिली। उसके बाद से ही सावन के महीने में भगवान शिव जी पर जल चढ़ाया जाता है। यह परंपरा तभी शुरू होई थी।