अध्यात्म

आखिर चीरहरण के समय श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाने के लिए पुकारने का क्यों किया था इंतजार..

जब द्रौपदी को बाल पकड़कर सभा में घसीट कर दुशासन के द्वारा लाया जा रहा था तब द्रोपदी अपनी शक्ति के अनुसार इसका सामना करती रही

आप सभी लोगों ने महाभारत की कहानी तो अवश्य सुनी होगी, महाभारत की कहानी में ऐसा बहुत कुछ हुआ है जिसकी कल्पना कर पाना बहुत ही कठिन है, महाभारत में द्रोपदी का पांच भाइयों की पत्नी बनना मुख्य तौर पर देखा जा सकता है, महाभारत की कहानी कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध पर आधारित है, कौरवों का अपने चचेरे भाइयों के लिए गुस्सा, लालच, मानसिक रूप से भटक जाना, बदले की भावना, ताकत का घमंड इत्यादि महाभारत के भयंकर युद्ध का कारण बना है, लेकिन आज हम आपको महाभारत में द्रोपदी चीर हरण के बारे में जानकारी देने वाले हैं ।

महाभारत में पांडव जुए में द्रौपदी को हार गए थे, युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगा दिया था और दुर्योधन की तरफ से मामा शकुनी जी ने द्रौपदी को जीत लिया था, जब द्रोपति को दुर्योधन की तरफ से शकुनि ने जीता तब उस समय दुशासन द्रोपदी को बालों से पकड़कर घसीटते हुए सभा में लेकर आ गया था, उस समय के दौरान भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, विदुर जैसे महान-महान लोग सभा में बैठे हुए थे, लेकिन सभी लोग नीचे मुंह लटकाए द्रोपति का यह अपमान देख रहे थे, किसी ने भी उनको रोकने की कोशिश ना की।

द्रोपदी को ऐसा एहसास नहीं था कि उसका चीर हरण होने वाला है

 

भरी सभा के अंदर द्रोपदी की लाज उतारी गई, लेकिन जब द्रोपदी को घसीट कर सभा के अंदर लाया जा रहा था तो द्रोपदी को बिल्कुल भी ऐसा एहसास नहीं हुआ कि उसका चीर हरण होने वाला है, जब द्रोपदी सभा में लाई गई, तब दुशासन ने भरी सभा में द्रोपदी की साड़ी उतारने के लिए कहा था, तभी द्रोपदी को ऐसा आभास हुआ कि यह संकट बहुत बड़ी है, ऐसी स्थिति में उनको लगा कि भगवान श्री कृष्ण जी के अलावा और कोई उनकी मदद नहीं कर सकता, इसीलिए द्रोपदी ने “हरी, हरी, अभयम कृष्णा, अभयम” का नाम पुकार कर अपने सखा भगवान श्री कृष्ण जी को बुलाया,

अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि आखिर भगवान कृष्ण जी ने द्रोपदी के पुकारने का इंतजार क्यों किया? वह द्रोपदी की लाज बचाने के लिए वहां पर तुरंत क्यों नहीं गए? इस संबंध में भगवान श्री कृष्ण जी के सखा उद्धव उनसे उद्धव गीता या उद्धव भागवत में कई सवाल करते हैं, आइए जानते हैं श्री कृष्ण और उनके सखा उद्धव में हुए इन संवाद के बारे में

भगवान श्री कृष्ण जी से उद्धव कहते हैं कि हे कृष्ण, आप तो पांडवों के सबसे प्रिय और करीबी मित्र हैं और इन्होंने आपके ऊपर हमेशा से ही पूर्ण विश्वास किया है, कृष्ण जी आप तो महान ज्ञानी है, आपको पूरी दुनिया की खबर रहती है, भविष्य में क्या होगा? भूतकाल में क्या हुआ था और वर्तमान में क्या हो रहा है, इन सभी बातों का आपको अच्छी तरह ज्ञान है, आप पांडव के सबसे सच्चे मित्र हैं, लेकिन जो कार्य आपने किया है क्या उससे आपको ऐसा लगता है कि आपने सच्चे मित्र की परिभाषा दी है?

अर्जुन ने लगाया भगवान पर आरोप

 

आपने धर्मराज युधिष्ठिर को जुआ खेलने से नहीं रोका, लेकिन आपने किस्मत को भी युधिष्ठिर के पक्ष में नहीं मोड़ा था, अगर आपकी इच्छा होती तो युधिष्ठिर जुए में कभी भी नहीं हारता, आप चाहते तो युधिष्ठिर की विजय होती ,  धर्मराज युधिष्ठिर जुए में अपने धन, राज्य और यहां तक की खुद को हार गए थे लेकिन उसके बावजूद भी आपने नहीं रोका, इसके बाद उन्होंने अपने भाइयों को दांव पर लगाया, इसके बाद भी आपने नहीं रोका, सब कुछ हारने के बाद दुर्योधन ने पांडवों को अच्छी किस्मत वाला बताने लगा और उसने द्रौपदी को दांव पर लगाने की सलाह दी, दुर्योधन ने पांडवों को कहा कि जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देगा, जिस लालच में पांडव आ गए, परंतु आपने उनको यहां पर भी नहीं रोका।

जब पांडव दुर्योधन के बहकावे में आकर द्रौपदी को दांव पर लगाने के लिए तैयार हो गए तब भी आपने उनकी सहायता नहीं की, अगर आप चाहते तो अपनी दिव्य शक्ति से पासे को धर्मराज की तरफ कर सकते थे, लेकिन तभी भी आप बीच में नहीं आए, जब द्रौपदी को पांडव जुए में हार गए तब उसकी लाज उतारी जा रही थी, तब आपने वस्त्र देकर द्रोपति की लाज बचाई परंतु आप यह दावा किस प्रकार कर सकते हैं? भरी सभा के अंदर द्रोपति को एक व्यक्ति घसीट कर लाया और सबके सामने निर्वस्त्र किया, एक महिला के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है, यहां पर आपने क्या किया, आपने किस प्रकार द्रोपदी की लाज बचाई? जब आपने मुसीबत के समय सहायता नहीं की तो इसका क्या फायदा हुआ? क्या यही धर्म है?

उद्धव के द्वारा पूछे गए इन सवालों को सुनकर भगवान श्री कृष्ण जी मुस्कुराने लगे और इन्होंने उद्धव से कहा कि यही सृष्टि का नियम है, जो विवेकमान होता है वही जीत हासिल करता है, उस समय के दौरान दुर्योधन के पास विवेक था परंतु धर्मराज के पास विवेक नहीं था, बस यही वजह थी जिसके कारण धर्मराज को हारना पड़ा था, भगवान श्री कृष्ण जी आगे बोले भले ही दुर्योधन के पास धन की कोई कमी नहीं थी परंतु उसको पासो का खेल खेलना नहीं आता था उसने अपने मामा शकुनि का इस्तेमाल किया था।

धर्मराज की प्राथना

 

श्री कृष्ण जी ने कहा कि अगर धर्मराज भी चाहते तो वह इस प्रकार की सोच रख सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश करवा सकते थे, उनकी तरफ से मैं खेलता अगर शकुनी और मैं खेलता तो विचार करो कि दोनों में से कौन विजय होता? दोनों में से कोई ना कोई तो जीत हासिल ही करता, सबसे बड़ी गलती उन्होंने मुझे खेल में शामिल ना करके की है, चलो इस बात को छोड़ते हैं, लेकिन एक बहुत बड़ी गलती भी हुई है।

उन्होंने मुझसे यह प्रार्थना की थी कि जब तक मैं सभा में ना जाऊं, जब तक वह मुझे ना पुकारे, क्योंकि वह मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे, वह नहीं चाहते थे कि मुझे इस बात का पता हो कि वह जुआ खेल रहे हैं, इन्होंने अपनी प्रार्थना से मुझे बांध दिया था, इसी वजह से मैं बाहर इंतजार कर रहा था, अगर मुझे कोई पुकारता तो मैं अवश्य जाता, लेकिन सब के सब जुए में इतने व्यस्त हो गए कि वह मुझे ही भूल गए और अपनी किस्मत और दुर्योधन को कोसने में लगे हुए थे।

जब द्रोपदी को निर्वस्त्र करना आरंभ किया जा रहा था तब उसकी बुद्धि जागी

भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा कि जब द्रोपति को बाल पकड़कर सभा में घसीट कर दुशासन के द्वारा लाया जा रहा था तब द्रोपदी अपनी शक्ति के अनुसार इसका सामना करती रही लेकिन उसने तभी भी मुझे नहीं पुकारा था, जब द्रोपदी को निर्वस्त्र करना आरंभ किया जा रहा था तब उसकी बुद्धि जागी, तब उसने मुझे याद किया, तब मैंने पहुंचकर रक्षा की, अब तुम ही बताओ ऐसी स्थिति में भला मेरी क्या गलती है?

भगवान कृष्ण जी ने यह सारी बात अपने सखा उद्धव को बताई, इस पर उद्धव बोले हे कृष्ण, आपने जो भी स्पष्टीकरण दिया है वह प्रभावशाली जरूर है परंतु मैं इन सब से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हूं, क्या मैं आपसे एक और सवाल पूछ सकता हूं, तब कृष्ण जी ने उद्धव को प्रश्न पूछने की अनुमति दी, तब उन्होंने कहा कि आपके इन सभी स्पष्टीकरण से यह अर्थ निकल कर आता है कि आप तभी जाओगे जब आपको बुलाया जाएगा? अगर आपका कोई भक्त किसी मुसीबत में फंसा हुआ है तो क्या आप अपने आप जाकर उसकी सहायता नहीं करेंगे?

श्री कृष्ण जी मुस्कुराते हुए उद्धव को कहते हैं की हर किसी को कर्मफल के आधार पर ही जीवन का संचालन होता है, मैं इसको नहीं चलाता और ना ही मैं हस्तक्षेप करता हूं, मैं तो मात्र एक साक्षी हूं, ईश्वर के धर्म के अनुसार में तुम्हारे नजदीक ही रहकर सब कुछ देखता रहता हूं।

हम पाप करते रहे और पाप की गठरी बंधती रहे

 

भगवान कृष्ण जी के इस जवाब पर उलाहना देते हुए उद्धव पूछते हैं कि इसका मतलब तो यही हुआ कि आसपास खड़े होकर आप सब कुछ देखते रहेंगे, अगर हम पाप कर रहे हैं तो आप पाप देखेंगे, जिसके आप साक्षी होंगे, आप यही चाहते हैं कि हम पाप करते रहे और पाप की गठरी बंधती रहे, जिसका फल भोगते रहे?

श्री कृष्ण जी उद्धव से कहते हैं कि तुम शब्दों के गहरे अर्थों को समझने की कोशिश करो, अगर तुम सब कुछ समझ कर इसका अनुभव करने लग जाओगे तो मैं तुम्हारे आसपास साक्षी के रूप में ही हर वक्त रहूंगा, क्या तुम उस समय कुछ गलत या बुरा कर पाओगे, निश्चित ही तुम कुछ भी बुरा नहीं कर पाओगे,अगर धर्मराज यह समझ लेते कि हर समय मैं उनके पास साक्षी के रूप में उपस्थित हूं तो कुछ नहीं होता, लेकिन वह अज्ञान थे और अज्ञान में ही वह जुआ खेल रहे थे, इस पर उद्धव मंत्रमुग्ध हो गए और उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा हे प्रभु कितना गहरा दर्शन है कितना महान सत्य बताया है।

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