अध्यात्म

माघ मेला में हैरान करने वाले होते हैं साधुओं के हठ योग, देखकर आपके भी छूट सकते हैं पसीने

हिंदू धर्म में पौष पूर्णिमा का बहुत महत्व होता है। पौष पूर्णिमा से ही माघ मेला शुरु होता है, इस बार पौष पूर्णिमा 10 जनवरी को पड़ा था। इस तिथि पर ही माघ मेले का पहला स्नान किया गया और इसी के साथ कल्पवास की शुरुआत हुई। माघ मेला धर्म और आस्था की नगरी प्रयागराज में लगा और ये 21 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलेगा। इस भव्य और विशाल मेले का आयोजन हर साल प्रयागराज में संगम के तट पर होता है और इस बार के मेले की शुरुआत के दिन ही चंद्रग्रहण था। इस मेले में कई साधु ऐसे-ऐसे हठ योग करते हैं जिनके बारे में सुनकर आप हैरान हो सकते हैं।

माघ मेले में साधुओं के हठ योग

उत्तर-प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में ऐसे बहुत से साधु-संत आते हैं जो अपने हठयोग के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हैं। आज हम आपको ऐसे ही साधुओं से जुड़ी कुछ बातें बताएंगे जिन्हें शायद ही आप जानते हैं..

दंडी

इसमें साधु अपने साथ दण्ड व कमंडल रखते हैं। दण्ड बांस का एक टुकड़ा होता है, जो पूरा गेरुआ कपड़े से ढका रहता है और ये किसी धातु की वस्तु को नहीं छू सकते। ये भिक्षा के लिए दिन में एक बार ही जाते हैं।

ऊर्ध्वबाहु

ऐसे संन्यासी अपने इष्ट (भगवान) को प्रसन्न करने के लिए अपना एक या दोनों हाथ ऊपर उठाकर रखते हैं। ऐसा इनका प्रयास रहता है कि पूरे मेले तक ऐसे ही रहें।

आकाशमुखी

इसमें संन्यासी आकाश की ओर देखते रहते हैं, और इन्हें ही आकाशमुखी कहते हैं। ये एक कठोर साधना है, जिसे बहुत ही कम साधु पूरा कर पाते हैं।

थारेश्वरी

इसमें संन्यासी दिन-रात खड़े रहने की शपथ लेते हैं और ऐसा मेला खत्म होने तक उन्हें करना होता है। वे खड़े-खड़े ही भोजन करते है और ऐसे ही सो भी जाते हैं। ऐसे साधुओं को हठयोगी भी कहते हैं।

नखी

इसमें संन्यासी सालों तक नाखून नहीं काटते, उन्हें नखी कहते हैं। इनके नाखून सामान्य से 20 गुना तक बड़े हो जाते हैं।

ऊर्ध्वमुखी

इसमें साधु अपने पैरों को ऊपर और सिर नीचा कर देते हैं। ये अपने पैरों को किसी पेड़ की शाखा से बांध कर लटकते रहते हैं। इसे सबसे कठिन हठयोग कहते हैं जिसे साधु किसी भी कीमत पर करते हैं।

पंचधुनी

इसमें साधु अपने चारों ओर आग जलाकर तपस्या करते हैं। मिट्टी के बर्तन में अंगारे लेकर अपने सिर पर रखकर भी इसकी साधना की जाती है।

मौनव्रती

इसमें संन्यासी मौन रहने की शपथ लेते हुए बिना बोले रहते हैं। अगर इन्हें किसी से कुछ कहना होता है तो कागज पर लिखकर उन्हें बताते हैं। ऐसे साधुओं को लोग बहुत पूजते हैं और इन्हें सच्चा तपस्वी कहते हैं।

जलसाजीवी

इसमें साधु किसी नदी या तालाब में सूर्योदय से लेकर सूर्योस्त तक कमर तक पानी में खड़े रहते हैं। इसी अवस्था में वे तपस्या करते हैं।

जलधारा तपसी

इसमें साधु गड्‌ढे में बैठकर अपने सिर पर घड़ा रखते हैं, जिसमें छेद कर देते हैं। इस घड़े का पानी छिद्रों से इन पर निरंतर गिरता रहता है।

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