ये सम्मलेन देख खुश हो जायेंगे गधे, चुनावी मौसम में कुछ भी हो सकता है, देखिये गधा सम्मलेन

किसी कवि ने लिखा था ‘जब नगीचे चुनाव आवत है, भात मांगो पुलाव आवत है.’ यूपी के विधानसभा चुनाव इस कविता के लिए बिल्कुल सटीक हैं, एक तरफ जहां विकास के मुद्दों से चुनाव प्रचार की शुरुआत हुयी वहीं चुनाव के दौरान प्रचार के मुद्दे बदल गए. विकास की जगह कब कुत्ते, गधे और घोड़ों ने ले ली कुछ पता नहीं चला. आलम ये है कि गधा इन्सान से भी बड़ा हो गया, इसपर कवि सुनील जोगी कहते हैं-

सुना है कि अब राजहठ पर अड़ा है, गधा इन दिनों आदमी से बड़ा है :

एक तरफ अखिलेश यादव गधों को हिकारत भरी नजरों से देखते हैं तो वहीँ पीएम मोदी गधों से प्रेरणा लेते हैं और उनकी तरह पूरी मेहनत और वफादारी के साथ काम करने की बात करते हैं. वहीं तीसरे पक्ष के तौर पर राहुल गांधी हमेशा कंफ्यूज ही रहते हैं कि वो क्या रिएक्शन दें. उनके लिए तो जैसे ये ख़ुशी का मौका है, आलू कि फैक्ट्री और भूकंप के बाद एक बार गधे भी चर्चा में आ गए हैं. लगता है अब वो दिन दूर नहीं है जब नेता लोग ये ऑफर भी करेंगे-

नेता जी ने वोटरों से कहा,- चाहोगे तो एक एक गधा फ्री में दिलवाऊंगा :

कुर्सी की दौड़ में हमारे नेता अंधे होते जा रहे हैं, कुर्सी के लिए खुद को गधा बनाना पड़े तो नेता खुद को गधा तक बनाने को तैयार हैं. यूपी चुनाव में जिस तरह से सियासत बदली है उससे लग रहा है कि नेताओं को अब मुद्दों की नहीं गधों की जरूरत है, इलाहाबाद से एक ऐसी खबर भी आई थी कि कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गधे को राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग की.

जो सियासत गुंडाराज, भ्रष्टाचार, विनिर्माण, रोजगार और सुरक्षा के इर्द गिर्द घूमनी चाहिए उसकी प्राथमिकतायें बदल चुकी है, अब चुनाव का फोकस व्यक्तिगत आक्षेप पर आ चुका है. लेकिन जनता बहुत समझदार है. जनता सबकुछ जानती है और हर बात का जवाब देगी. जनता को भी दिख रहा है कि किस तरह से चुनाव के मुद्दे गायब हुए और सियासत धूमिल हो गयी. जनता हर बार अपना फैसला सुनाती है, और जनता का फैसला ही सबसे बड़ा होता है, जनता के फैसले को हम जनादेश कहते हैं.

जनता का फैसला भी जल्द ही सामने आ जायेगा उससे पहले देखिये ये गधा सम्मलेन, जिसमें आपको गुदगुदाते हुए जनता के मन की बात कहने की कोशिश की गयी है-

देखिये वीडियो-

https://youtu.be/E9lJL669Tu0

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