नरक चतुर्दशी कथा: जानें क्यों भगवान श्रीकृष्ण ने 16 हजार लड़कियों को दिया था अपना नाम

नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है और इस साल ये पर्व दीपावली के साथ यानी 27 अक्टूबर के दिन आ रहा है। नरक चतुर्दशी के दिन रात के समय दीपक जलाया जाता है और इस दिन घर में दीपक जलाने से दो पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं।

पहली पौराणिक कथाएं

पहली कथा के अनुसार एक नरकासुर नामक राक्षस हुआ करता था। इस राक्षक ने लगभग सोलह हजार लड़कियों से जबरदस्ती विवाह कर लिया था और इन सभी लड़की को अपना सेवक बना लिया था। नरकासुर इन सभी लड़कियों पर काफी अत्याचार करता था और सदा इनको कैद में रखता था। वहीं  नरक चतुर्दशी  के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया था और इस असुर की कैद से लगभग सोलह हजार लड़कियों को  मुक्त कराया था। जिसके बाद इन कन्याओं ने समाज द्वारा स्वीकार नहीं किए जाने के डर से आत्महत्या करने की इच्छा जाहिर की थी। इन कन्याओं को आत्महत्या करने से रोकने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने इनको अपना नाम दिया। जिसके बाद इन सभी कन्याओं ने भगवान श्रीकृष्ण का अभार प्रकट करने के लिए दीप जलाए थे। तब से नरक चतुर्दशी के दिन दीपक जलाने की प्रथा शुरू हो गई और इस दिन लोगों द्वारा दीपक जलाए जाने लगें।

दूसरी पौराणिक कथाएं

नरक चतुर्दशी मनाने से जुड़ी दूसरी कथा के अनुसार एक रंति देव नामक राजा हुआ करता था। ये राजा सदा लोगों की सेवा करता था और धार्मिक कार्यों में लगा रहता था। एक दिन इस राजा को लेने के लिए एक यमदूत आ जाता है। यमदूत को देख राजा डर जाता है और राजा यमदूत से कहता है, अभी मेरी आयु ज्यादा नहीं है और मैंने जीवन में कोई गलत काम भी नहीं किया है, तो आप मुझे क्यों लेने के लिए आए हैं। यमदूत ने तब राजा को बताया कि तुमने जीवन में हमेशा अच्छे ही कार्य किए हैं। लेकिन एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखे पेट ही लौट गया था। जिसकी वजह से आपको में लेने के लिए आया हूं। राजा ने यमदूत से एक साल और मांग लिए और कहा कि वो उन्हें एक साल बाद लेने के लिए आए। यमदूत ने राजा की बात को मान लिया और राजा को एक साल का जीवन दान दे दिया। जीवन दान मिलने के बाद राजा कई सारे ऋषियों से मिले और उनसे इस पाप से मुक्ति पाने का उपाय पूछा।

ऋषियों ने राजा को कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी और व्रत के साथ-साथ ब्राह्मणों को भोजन करवाने को कहा। राजा ने ऋषियों की बात को मानते हुए नरक चतुर्दशी के दिन व्रत रखा और ब्राह्मणों की खूब सेवा की। ऐसा करने से  राजा को पाप से मुक्ति  मिल गई और राजा को नरक लोक की जगह विष्णु लोक भेजा गया। इसलिए कहा जाता है कि नरक चतुर्दशी के दिन व्रत करने से पापों से मुक्ति मिल जाती है और मौत के बाद नर्क की जगह स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है।

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