अध्यात्म

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़ी हुई हैं ये दो प्रचलित कथाएं

भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा दुनिया भर मेें प्रसिद्ध है और हर साल इस यात्रा को निकाला जाता है। इस यात्रा का हिस्सा बनने के लिए लोग काफी उत्सुक होते हैं और पुरी शहर आकर इस यात्रा में शामिल होते हैं। इस साल ये रथ यात्रा  4 जुलाई से शुरू हो रही है। इस रथ यात्रा को निकलाने के पीछे कई सारी कथाएं भी जुड़ी हुई हैं और इन्हीं कथाओं में दो कहानी काफी प्रचलित हैं, जो कि इस प्रकार हैं-

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़ी पहली कथा

ऐसा कहा जाता है कि राजा राम चन्द्र देव भगवान जगन्नाथ जी के काफी बड़े भक्त हुआ करते थे और रोज पुरी में बनें इनके मंदिर में जाकर इनके दर्शन किया करते थे। राम चन्द्र देव ने एक दिन अपना धर्म बदल लिया और अन्य धर्म महिला से विवाह कर लिया। जिसकी वजह से उन्हें पुरी के मंदिर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं दी गई। राम चन्द्र देव की भगवान जगन्नाथ पर काफी आस्था थी। इसलिए उन्होंने भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के लिए रथ यात्रा निकाली। ताकि वो बिना मंदिर में प्रवेश किए अपने प्रभु के दर्शन कर सकें। तब से हर साल ये रथ यात्रा निकाली जाने लगी है।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़ी दूसरी कथा

भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा से जो दूसरी कथा जुड़ी हुई है वो इस प्रकार है। कहा जाता है कि स्नान पूर्णिमा यानी ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्म हुआ था। भगवान जगन्नाथ जी का जन्म होने के बाद उनके बड़े भाई बलराम जी और बहन सुभद्रा जी उन्हें अपने साथ मंदिर के पास बने एक स्नान मंडप में ले गए और वहां पर उनका शाही स्नान किया गया। ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ जी को कुल 108 कलशों से स्नान करवाया गया था। इस स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ जी बीमार पड़ गए और उनको तेज बुखार हो गया। तब उन्हें 15 दिनों के लिए एक कक्ष के अंदर रखा गया और इस कक्ष में केवल भगवान जगन्नाथ के सेवक और वैद्यों को ही जाने की अनुमति थी। इस दौरान मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति के प्रतिनिधि के तौर पर अलारनाथ जी की प्रतिमा रखी गई थी और इस प्रतिमा की पूजा लोग आकर किया करते थे।

वहीं 15 दिनों के बाद भगवान जगन्नाथ जी एकदम सही हो गए और अपने कक्ष से बाहर निकलकर उन्होंने भक्तों को दर्शन दिए। इसके बाद भगवान जगन्नाथ जी  को उनकी नगरी दिखाने के लिए एक रथ यात्रा का आयोजन किया गया और वो अपने भाई बलराम जी और बहन सुभद्रा जी के साथ रथ पर विराजमान होकर अपनी नगरी के भ्रमण पर निकले। जब से हर साल भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा को निकाला जाने लगा।

भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा के दौरान बेहद ही भव्य समारोह का आयोजन किया जाता है और भक्त अपने हाथों से भगवान जगन्नाथ जी के रथ को खींचते हुए  गुंडीचा मंदिर लेकर जाता है। इस मंदिर को भगवान जगन्नाथ जी की मौसी का घर कहा जाता है और भगवान जगन्नाथ जी कुछ दिनों तक यहां पर आसाम करते हैं। जिसके बाद फिर से उन्हें पुरी के मंदिर ले जाया जाता है।

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