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सपा की लड़ाई सिर्फ एक नौटंकी : एक सोची-समझी गंदी राजनीति है मुलायम और अखिलेश झुठी लड़ाई

नई दिल्ली/लखनऊ – यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल गए हैं। मुलायम को पार्टी और पद दोनों से हाथ धोना पड़ा है तो वहीं दूसरी तरफ अपनी साख भी गवानी पड़ी है। चुनाव आयोग ने सोमवार को बाप-बेटे की “साइकल” की जंग में बेटे को साइकल का नया हकदार बताया है। इससे कुछ दिन पहले ही मुलायम सिंह यादव ने एक संवादाता सम्मेलन में कहा था कि, ”अखिलेश मेरा ही लड़का है। अब हम क्‍या करें। जो वह कर रहा है उसे करने दो। मार थोड़ी देंगे उसे।” अब जब मुलायम से सब कुछ छिन लिया गया है फिर भी वो अपने बेटे पर पूरी तरह मेहरबान दिख रहे हैं। Samajwadi party and congress alliance.

एक सोची-समझी गंदी राजनीति है मुलायम और अखिलेश झुठी लड़ाई –

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पार्टी और उसका सिंबल छिने जाने के एक दिन बाद ही मुलायम सिंह यादव बेटे अखिलेश पर काफी नरम दिख रहे हैं। सोमवार को मुलायम ने अखिलेश को मुस्लिम विरोधी बताया फिर मंगलवार को यह भी बोल दिया कि वें उनके खिलाफ न कोई कैन्डिडेट्स उतारेंगे न ही चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाएंगे। अगर हम शुरु से सपा के विवाद पर नज़र ड़ाले तो एक बात तो साफ नज़र आती है कि यह वैसी लड़ाई नहीं हो जो दिखाए जाने कि कोशिश कि जा रही है। यह बाप बेटे कि राजनीतिक और यूपी के विकास के मुद्दे कि लड़ाई से कही ज्यादा कुर्सी के लालच कि लड़ाई लग रही है।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले एक ई-मेल लीक के जरिए यह खुलास हुआ था कि यूपी में अखिलेश कि छवि सुधारने और विकासपुरुष का तगमा दिलाने के लिए अमेरिका के एक प्रोफेसर ने सपा में बाप-बेटे की जंग का नाटक करने कि सलाह दी थी।

डूबती कांग्रेस से अखिलेश मिलाएंगे हाथ, यूपी में होगा महागठबंधन –

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पार्टी और पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकल पर कब्जे की लड़ाई में अखिलेश ने पहले से प्लान कर रचे गए ड्रामें में सबको मात दे दी। लेकिन, अखिलेश को लग रहा है कि यदि भाजपा के विरोध में बिहार की तरह महागठबंधन नहीं बना तो भाजपा के विजयरथ को रोक पाना संभव नहीं होगा। क्योंकि 2014 को लोकसभा चुनाव में सपा को 22 व कांग्रेस को 7.5 प्रतिशत वोट ही मिले थे। ऐसी उम्मीद है कि कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन का निर्णय अगले 48 घंटों के भीतर हो जाएगा। अखिलेश के अलावा राहुल गांधी को भी इस बात का अहसास हो गया कि यदि अकेले चुनाव मैदान में उतरें तो 2014 जैसा ही हाल होगा। इसलिए कांग्रेस पार्टी के पास सपा का पुछल्ला बनने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं था।

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