जब अपने भक्त की रक्षा करने के लिए विष्णु ने लिया था नृसिंह रूप, पढ़े नृसिंह अवतार से जुड़ी कथा 17 मई को है नृसिंह जयंती, इस दिन व्रत और नृसिंह भगवान की पूजा करने से भक्तों की हो जाती है हर मनोकामना पूरी

भगवान श्री नृसिंह विष्णु के अवतार हैं और इनको शक्ति और बल का देवता माना जाता है। मान्यता है कि वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को ही भगवान श्री नृसिंह प्रकट हुए थे और इन्होंने अपने सबसे बड़े भक्त प्रहलाद की रक्षा उसके पिता से की थी। जिसके बाद से हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह जयंती के तौर पर मनाया जाने लगा। इस साल भगवान श्री नृसिंह की जंयती 17 मई के दिन आ रही है और इस दिन लोग भगवान श्री नृसिंह की पूजा जरूर करते हैं ।

भगवान श्री नृसिंह से जुड़ी कथा

मान्यताओं के अनुसार हिरण्यकशिपु नामक एक राजा हुआ करता था और हिरण्यकशिपु ने कठोर तप कर भगवान से ये वरदान हासिल किया था कि उसका वध किसी भी शस्त्र से ना हो सके है और कोई भी देवता, मनुष्य या पशु उसे मार ना सके। हिरण्यकशिपु को मिले वरदान के अनुसार उसका वध ना ही धरती पर हो सकता था ना ही आसमान पर, वो ना दिन में मर सकता था और ना ही रात में। ये वरदान मिलनेे से हिरण्यकशिपु को ये लगने लगा की वो अजेय है और उसका वध कोई भी नहीं कर सकता है।

वरदान मिलने के बाद हिरण्यकशिपु ने अपने राज्य में भगवान की पूजा करने पर प्रतिबंध लगा दिया था और जो भी भगवान की पूजा करता था उसे हिरण्यकशिपु  कठोर सजा देता था। हिरण्यकशिपु का एक बेटा हुआ करता था जिसका नाम प्रहलाद था। प्रहलाद हर वक्त भगवान विष्णु की ही पूजा किया करता था। अपने बेटे को भगवान विष्णु की पूजा करने से हिरण्यकशिपु ने कई बार रोका लेकिन वो हर बार असफल रहा। हिरण्यकशिपु ने अपने बेटे प्रहलाद पर कई सारे अत्याचार भी किए और उसको कई बार मारने की कोशिश भी की लेकिन हर बार भगवान विष्णु उसे बचा लेते थे।

एक बार प्रहलाद की भक्ति को देख हिरण्यकशिपु को उसपर काफी गुस्सा आया और हिरण्यकशिपु ने अपने बेटे प्रहलाद को अपने दरबार में बुलाया। दरबार में बुलाकर हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद को गुस्से में कहा कि तुम भगवान विष्णु की पूजा करना बंद कर दो।

अपने पिता की बात सुनने के बाद प्रहलाद ने उनसे कहा ‘पिताजी इस संसार को भगवान ने ही बनाया है और इस संसार की हर एक चीज में भगवान का वास है। आप बताओं मैं कैसे भगवान की पूजा करना बंद कर दूं।

अपने बेटे के मुंह से ये बात सुन हिरण्यकशिपु को और गुस्सा आ गया और उसने प्रहलाद से कहा- ‘अगर तेरा भगवान हर जगह है तो बता इस खंभे में वो क्यों नहीं दिखाई देता है? हिरण्यकशिपु के ये कहते ही खंभे से नृसिंह भगवान प्रकट हो गए और उन्होंने हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। हिरण्यकशिपु का वध करते समय नृसिंह भगवान ने उसे अपनी जांघ पर रखा था जिसकी वजह से हिरण्यकशिपु का शरीर ना ही धरती पर था और ना ही आसमान पर। वहीं जिस वक्त उन्होंने हिरण्यकशिपु का वध किया उस समय ना ही दिन था और ना ही रात। साथ में भगवान नृसिंह ना ही इंसान थे और ना ही पशु और उन्होंने  हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए शस्त्र की जगह अपने नाखूनों का इस्तेमाल किया था। जिसके चलते हिरण्यकशिपु को मिला वरदान भी नहीं टूटा और उसका वध भी हो गया।