उर्जित पटेल से पूछे गये सवालों पर संसद की आर्थिक मामलों की समिति को दिया जवाब. आरबीआई ने नोटबंदी पर संसद की वित्तीय मामलों की समिति ‘लोक लेखा समिति’ की प्रश्नावली का जवाब भेज दिया है लेकिन आरबीआई के जवाब और सरकार के पुराने बयानों को देखा जाये तो दोनों में अंतर है. ऐसे में केंद्र सरकार के दावों पर सवाल उठने लगा है.

रिज़र्व बैंक ने 7 पन्नों का जवाब सौंपा :

लोक लेखा समिति को रिज़र्व बैंक ने 7 पन्नों का जवाब सौंपा है. रिज़र्व बैंक ने कहा की नोटबंदी की अनुशंसा केंद्र सरकार की सलाह पर की गई थी. दूसरी तरफ सरकार कई मौकों पर नोटबंदी के पीछे रिज़र्व बैंक की सलाह को कारण बताती रही है.

रिज़र्व बैंक के नोट में कहा गया है कि 7 नवम्बर 2016 को केंद्र सरकार ने केन्द्रीय बैंक यानी की रिज़र्व बैंक को सलाह दी थी कि जालसाजी, आतंकवादियों को मिलने वाली वित्तीय मदद और काले धन को रोकने के लिये 500 और 1000 के पुराने नोटों को हटाने पर विचार करना चाहिये. और उसके अगले ही दिन केन्द्रीय बैंक ने सरकार की इस सलाह की अनुशंसा कर दी थी.

रिज़र्व बैंक ने बताया की इस सलाह पर विचार करने के लिये रिज़र्व बैंक के सेन्ट्रल बोर्ड की बैठक हुई, बैठक के बाद केंद्र सरकार की सलाह पर नोटबंदी का फैसला लिया गया. उसके बाद 8 नवम्बर को पीएम मोदी ने केंद्रीय कैबिनेट के साथ बैठक की. बैठक में 500 और हजार के नोट बंद करने पर अनुशंसा कर दी गई. जबकि फैसले के बाद कुछ मंत्रियों ने कहा था की फैसले के पीछे आरबीआई की अनुशंसा थी.

रिज़र्व बैंक ने यह भी कहा कि पिछले कुछ साल से आरबीआई नये नोट की सीरीज बाजार में लाने की तैयारी कर रहा था. जिससे नोट की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और जालसाजी भी रोकी जा सके, साथ ही केंद्र सरकार भी काले धन और आतंकवादियों को मिलने वाली आर्थिक सहायता पर रोक लगाने की कोशिश में लगी हुई थी.

रिज़र्व बैंक ने अपने जवाब में यह भी लिखा है कि खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट्स में यह जानकारी मिली थी कि 500 और 1000 के नोट से काला धन बढ़ रहा है साथ ही आतंकियों को भी आसानी से आर्थिक सहायता मिल रही थी. इन समस्यायों से निपटने के लिये रिज़र्व बैंक ने नई सीरीज की नोट जारी करने और पुरानी नोट पर रोक लगाने का फैसला लिया. आरबीआई पहले नई सीरीज के नोट निकलने की तैयारी में था, नोटबंदी का फैसला बाद में लिया गया.

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