100 साल के भारतीय सिनेमा इतिहास में इन 10 फिल्मों की जगह आजतक कोई फिल्म नहीं ले पाई स्क्रिप्ट,निर्देशन और एक्टिंग के लिए हमेशा याद रहेंगी बॉलीवुड की 100 सालों में बनी ये फि, इस फिल्म में शायद ही कोई होगा जिन्होंने कोई कमी निकाली हो.

साल 1913 में भारतीय सिनेमा का निर्माण हुआ था जिसमें पहले मूक फिल्में बनती थी, इस फिल्मों कोई बोलता नहीं था बस एक्टिंग की जाती थी. फिर चलचित्र सिनेमा शुरु हुआ और फिर धीरे-धीरे समय बदला ब्लैक-एन-व्हाइट का जमाना कलर में बदल गया. इस तरह से धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा में कई अलग-अलग जगह फिल्मों का निर्माण होेने लगा. मगर सबसे पहले बॉलीवुड ही बना जहां हिंदी फिल्में बनी थीं. इन सालों में कुछ ऐसी फिल्में हैं जो बेहतरीन अदाकारी के लिए हमेशा याद रहेंगी बॉलीवुड की 100 सालों में बनी ये फिल्में, इनमे आपकी भी कोई फेवरेट तो होगी ही.

हमेशा याद रहेंगी बॉलीवुड की 100 सालों में बनी ये फिल्में

फ़िल्मों के साथ भारत का इतिहास 100 साल से भी पुराना हैं. तब से अब तक यहां पर कई लाख फिल्में बन चुकी हैं और इन फिल्मों में कोई 10 फिल्मों को चुनना कोई आम बात नहीं है.इसके बावजूद हम आपको बताएंगे उन 10 फिल्मों के बारे में जिसने भारतीय सिनेमा की काया को पलट कर रख दिया.

मदर इंडिया (1957)

ऑस्कर के लिए भेजी गई फ़िल्म मदर इंडिया को सिर्फ़ एक वोट से चयन नहीं मिल पाया था. फिल्म में एक मां की ऐसे संघर्ष की कहानी को दिखाया गया जो शायद ही किसी फिल्म में दिखाया गया होगा. बहुत कम लोगों को पता है कि ये फ़िल्म इसके निर्देशक महबूब ख़ान की एक पुरानी फ़िल्म औरत(1940) की रीमेक रही है.

मुगल-ए-आजम (1960)

हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री की शायद इससे महंगी फिल्म बनी हो. उस दौर की ये फिल्म इतिहास में दर्ज हो गई जिसका सेट सबसे महंगा बनाया गया था उस दौर से 90 के दशक तक तो कोई इससे महंगी फिल्म नहीं बना पाया था. के. आसिफ़ की बेहतरीन रचना है मुग़ल-ए-आज़म. दिलीप कुमार, पृथ्वीराज कपूर और मधुबाला ने लीड रोल में बेहतरीन अदाकारी की है. फिल्म में संगीत, सेट, संवाद, कहानी, क्लाइमेक्स इन सब ने इसे एक अलग ही मुकाम पर पहुंचाया.

आनंद (1971)

फ़िल्म आनंद में राजेश खन्ना ने ऐसा किरदार निभाया कि सबके दिल में एक आनंद बस गया. कहानी है एक ऐसे इंसान की जो एक जानलेवा बिमारी से ग्रस्त होता है और उसे पता है कि उसके पास गिनती के दिन बचे हैं फिर भी वो हर लम्हे को अच्छे से जीता है. राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की अदाकारी सबकी आखें नम कर देती हैं और ऋषिकेश मुखर्जी ने इस यादगार फ़िल्म का निर्देशन और लेखन किया था.

शोले (1975)

साल 1975 में आई निर्देशक रमेश सिप्पी की फिल्म शोले एक ऐतिहासिक फिल्म बन गई है. ऐसा कोई नहीं जिसे शोले नहीं पसंद. फिल्म में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, अमजद खान और संजीव कुमार के शानदार अभिनय ने जान डाल दी थी. वहीं सलीम-जावेद के मस्त डायलॉग ने दर्शकों को 5 सालों तक सिनेमाघरों में बांध कर रखा था.फिल्म ने कई अवॉर्ड जीते और भारतीय सिनेमा के इतिहास में भी इसका नाम दर्ज हो गया.

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995)

साल 1995 में आई निर्देशक आदित्य चोपड़ा की फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, उस दौर की बेहतरीन फिल्म थी. शाहरुख खान और काजोल पर बनी राज और सिमरन की लव स्टोरी हर किसी के दिल में उतर गई और हिंदी सिनेमा के इतिहास में इस फिल्म का नाम दर्ज हो गया. इस फिल्म को मुंबई के एक मराठा टेंपल थिएटर में करीब 20 सालों तक चलाया था. इसके अलावा मात्र 4 करोड़ में बनी इस फिल्म ने अरबों का कारोबार किया था.

सत्या (1998)

साल 1998 में आई फिल्म सत्या में दिखाया गया था कि किस तरह एक क्रिमिनल एक अच्छा इंसान बनता है और फिर एक अच्छा इंसान क्रिमिनल. मुंबई और उसके गैंगस्टर्स के ऊपर कई फ़िल्में पहले बनी लेकिन सत्या जैसी शायद ही कोई हो. इस फ़िल्म ने गैंगस्टर्स की ज़िंदगी के हिंसक पहलु से अलग हिस्से को भी दिखाया है. फिल्म में मनोज वाजपेई के किरदार को खूब पसंद किया गया था आलोचकों ने इस फिल्म क दिल खोलकर स्वीकार किया था.

लगान (2001)

साल 2001 में आई फिल्म लगान भारत की वो तीसरी फ़िल्म थी जिसे Academy Award For Best Foreign Language Film में जगह मिली थी. 3 घंटे 45 मिनट लंबी होने का बाद भी लोगों ने इस फिल्म को दिल खोलकर अपनाया था. फिल्म की कहानी को आशुतोष गोवारिकर ने बहुत ही ढंग से लिखा था और आमिर खान ने भुवन का किरदार भी दिलचस्प था.इस फिल्म से ही आमिर ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी शुरू की और इस फ़िल्म को प्रोड्यूस किया.

रंग दे बसंती (2006)

साल 2006 में आई फिल्म रंग दे बसंती नए ज़माने की देशभक्ति पर आधारित थी. फ़िल्म के निर्देश्क राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने फ़िल्म पर करीब 7 सालों तक रिसर्च की और बाद में ये साबित हुआ कि फ़िल्म पर किया गया ये इनवेस्टमेंट सफ़ल रहा. देश के साथ-साथ विदेशों में भी इसकी ख़ूब तारीफ़ हुई थी.

अ वेडनसडे (2008)

1 घंटा 40 मिनट की इस फ़िल्म को एक बार जरूर देखना चाहिए. एक आम आदमी का गुस्सा जब सिस्टम पर फूटता है तब क्या हो सकता है इसे बखूबी दिखाया गया है. इस फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस और आलोचकों दोनों का प्यार मिला. डायरेक्टर नीरज पांडे की ये पहली फ़िल्म थी.

बाहूबली (2015)

साल 2015 में फिल्म बाहुबली का दूसरा पार्ट साल 2017 में आया और दोनों ही फिल्मों ने बॉक्स-ऑफिस पर एक रिकॉर्ड बना दिया. फिल्म बच्चे-बच्चे के जुबान पर चढ़ गया था, और फिल्म ने 2000 करोड़ के पार का बिजनेस किया था.इस फिल्म का नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया और फिल्म की कहानी, सभी की एक्टिंग और निर्देशन लोगों को खूब प्रभावित कर गया था.