किसी भी इंसान का भाग्य उसके अच्छे या बुरे कर्म ही बनाते हैं जिसका उल्लेख रामायण में भी मिलता है कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम कोई कोई अपनी तरफ से पूरी मेहनत और लगन के साथ करते मगर उसके बाद भी ऐसा होता है की उसके नतीजे विपरीत आते हैं

आपने अक्सर ही लोगों द्वारा यह कहते सुना होगा की आपके अच्छे या बुरे कर्मों की सजा आपको अगले जन्म में जरूर मिलेगी जबकि आपको बताते चलें की हमारे द्वारा दिये गए तमाम अच्छे या फिर बुरे कर्मों की सजा और पुरस्कार आदि सब कुछ हमें इसी जन्म में ही मिलता है और इस बात का उल्लेख हमारे हिन्दू धर्म के सबसे बड़े ग्रन्थों में से एक रामायण में भी मिल जाता है। आज हम आपको रामायण से ही एक ऐसा किस्सा बताने जा रहे है जिसके बारे में जानता तो हर कोई है मगर आज इस किस्से को फिर से बताने का मतलब ये हैं की आपको भी इस बारे में पता चल जाए की किसी भी इंसान के कर्मों का फल उसे किसी और जन्म में नहीं बल्कि उसके उसी जन्म में भी मिलता है फिर चाहे वो अच्छा कर्म हो या फिर बुरा उसका फल मिलना भी तय है। तो चलिये जानते हैं रामायण से वो लोकप्रिय प्रसंग जो हमे इस बारे में पूर्ण रूप से अवगत करता है।

बताते चलें की हिन्दू धर्म की मशहूर ग्रंथ रामायण की बहुत सी बातें प्रेरणादायी हैँ और गहरे अर्थ वाली हैँ, इसमे आपको कुछ प्रसंग ऐसी भी मिल जाते हैँ जो मनुष्य के भाग्य को लेकर उसके कर्मों से प्रभावित होता है। जब मनुष्य को अपने जीवन में मनचाहा फल नहीं मिलता तो उसे अपने अतीत में झाँक लेना चाहिए और चिंतन करना चाहिए। ऐसा ही एक प्रसंग रामायण के अनुसार भी है जब राजा दशरथ अपनी कुमार अवस्था में थे तो एक बार वह आखेट पर गए थे और उसी दौरान उन्होंने तालाब से ध्वनि आने पर मृग के भ्रम में शब्दभेदी बाण चला दिया था परंतु वह कोई मृग या अन्य जानवर नहीं था बल्कि वह श्रवण कुमार था जो अपने अंधे माता पिता को तीर्थयात्रा करवाने ले जा रहा था और उनके लिये एक मटका जल लेने आया था।

जब राजा ने देखा कि उनके बाण से कोई जीव घायल हो गया है तो वे दौड़े दौड़े आते हैँ मगर तब उन्हे काफी ज्यादा अफ़सोस होता है की वो कोई मृग या अन्य जीव नहीं बल्कि इंसान है। वह कुमार उनसे विनती करता है कि उसके अंधे माता पिता उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैँ उन्हें उसकी मृत्यु के बाद कौन देखेगा और अपने प्राण त्याग देता है। राजा यह दुखभरा समाचार लेकर उसके माता पिता के पास जाते हैँ। उसके माता पिता उसके विरह में विलाप करते हैँ और राजा को श्राप देते हैँ कि जैसे वे अपने पुत्र के विरह में तड़प रहे हैँ तुम भी तड़पोगे और तुम्हारी मृत्यु के समय तुम्हारा एक भी पुत्र तुम्हारे पास नहीं होगा और प्राण त्याग देते हैँ। इस श्राप का फल राजा को श्रीराम के वनवास के समय मिला जब उनकी मृत्यु के समय उनके चार पुत्रो में से एक भी पुत्र उनके पास नहीं था।

असल में अक्सर ऐसा देखा गया है की हम जिस तरह का काम करते हैं कमोवेश वैसा ही कुछ हमारे भाग्य का भी निर्माण होता है। आपको यह भी बता दें की कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम कोई कोई अपनी तरफ से पूरी मेहनत और लगन के साथ करते मगर उसके बाद भी ऐसा होता है की उसके नतीजे विपरीत आते हैं और ऐसी स्थिति में आते ही लोगों को यह कहने का मौका मिल जाता है कि हमारी किस्मत में ऐसा ही लिखा था।