मौनी अमावस्या क्यों मनाया जाता है जानिये इस से जुड़ी पौराणिक कथा और व्रत रखने का महत्व

हर वर्ष 12 अमावस्या आती हैं और हर महीने एक अमावस्या होती है. वहीं इन 12 अमावस्याओं के नाम ये जिस महीने में आती हैं उनपर आधारित होते हैं. इस साल की पहली अमावस्या जनवरी के महीने में आ चुकी है और फरवरी के महीने की अमावस्या चार तारीख को आने वाली है. जिसे मौनी अमावस्या  कहा जाता है. हालांकि कई लोगों द्वारा इस अमावस्या को सोमवती अमावस्या के नाम से भी पुकारा जाता है. वहीं मौनी अमावस्या के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है जो कि इस प्रकार है-

मौनी अमावस्या की पौराणिक कथा

इस अमावस्या से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार एक ब्राह्मण अपनी पत्नी धनवती, सात बेटे और एक बेटी के संग कांचीपुरी में रहा करता था. देवस्वामी नामक इस ब्राह्मण ने अपने सातों बेटों की शादी करवाने के बाद अपनी बेटी के विवाह करवाने की जिम्मेदारी अपने बेटों को सौंप दी और अपने बेटों को अपनी बहन गुणवती के लिए एक अच्छा पति ढूंढने का कार्य सौंपा.

ब्राह्मण का बड़ा बेटे अपनी बहन के लिए वर खोजने के कार्य में लग गया. वहीं इसी बीच देवस्वामी ने अपने बेटी की कुंडली एक पंडित को दिखाई. पंडित ने गुणवती की कुंडली देखकर देवस्वामी को बताया कि जैसे ही इसकी बेटी के सातों फेरे हो जाएंगे, तभी इसके पति का निधन हो जाएगा. पंडित की ये बात सुनकर देवस्वामी काफी डर गया और उसने अपनी बेटी की कुंडली के वैधव्य दोष का हल मांगा.

पंडित ने देवस्वामी को इस दोष का हल बताते हुए कहा कि सोमा नाम कि एक महिला इस दोष को खत्म कर सकती है और सोमा की पूजा की मदद से उसकी बेटी के पति को कुछ नहीं होगा. सोमा का नाम सुनते ही देवस्वामी ने पंडित से इनका पता मांगा. पंडित ने सोमा का पता देते हुए देवस्वामी को बताया कि ये एक धोबिन है जो कि सिंहल द्वीप के पास रहती है. अगर सोमा को अपनी बेटी की शादी में तुम बुला लेते हो तो तुम्हारी बेटी विधवा नहीं होगी.

बेटी और बेटे को भेजा सोमा की तलाश में

पंडित की बात सुनने के बाद देवस्वामी ने बिना किसी देरी के तुरंत अपनी बेटी गुणवती को उसके सबसे छेटे भाई के साथ सोमा को घर लाने के लिए भेज दिया. हालांकि सोमा जहां रहती थी वहां तक पहुंचने के लिए इन्हें सागर को पार करना था और जैसे ही ये सागर के पास पहुंचे इनको ये समझ नहीं आया कि ये इसको पार करके सिहंल द्वीप कैसे जाएं.  इसी बीच ये दोनों भाई बहन आराम करने के लिए एक वृक्ष के नीचे बैठ गए. इस वृक्ष के ऊपर ही एक घोंसला भी बना हुआ था और इस घोंसले में एक गिद्ध अपने बच्चों के साथ रहती थी.

इन दोनों भाई बहन को वृक्ष के नीचे काफी देर तक बिना कुछ खाए बैठा देख गिद्ध के बच्चे परेशान होने लगे. जैसे ही गिद्ध के बच्चों की मां वापस अपने घोसले में आई तो इन्होंने अपनी मां को बताया कि ये दोनों काफी देर से नीचे बैठे हैं और ये भूखे भी हैं.

गिद्ध ने कराया सागर पार

गिद्ध ने अपने बच्चों की बात सुनकर इन दोनों भाई बहन से बात की और उनसे उनकी परेशानी पूछी. इन्होंने गिद्ध को अपनी सारी कहानी सुनाई. जिसेक बाद गिद्ध ने इन्हें कुछ खाना खाने की सलाह दी और कहा कि वो सुबह इनको ये सागर पार करवा देगी. सुबह होते ही उस गिद्ध ने इन दोनों भाई बहन को ये सागर पार करवा दिया और ये सोमा के घर जा पहुंचे.

सोमा से की मुलाकात

सोमा के घर पहुंचने के बाद इन दोनों भाई बहन ने बिना किसी को बताए सोमा के घर को साफ कर दिया और घर को रंग से अच्छे से लेप दिया. वहीं जब सोमा घर आई तो वो अपने घर को साफ और चमका देख हैरान हो गई.सोमा ने अपनी बहुओं से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ये सब उन्होंने किया है.

हालांकि सोमा को अपनी बहुओं पर यकीन नहीं हुआ. वहीं कुछ दिनों बाद ये भाई बहन फिर से सोमा का घर साफ करने लगे और सोमा ने इन्हें पकड़ लिया. इन्होंने सोमा को अपनी पूरी कहानी सुनाई जिसके बाद सोमा इनके साथ गुणवती के विवाह में जाने के लिए राजी हो गई.

गुणवती और उसके भाई के साथ उनके घर जाने से पहले सोमा ने अपनी बहु को आदेश दिया की अगर उसके जाने के बाद किसी की मृत्यु हो जाती है. तो वो उनको जलाए नहीं और उनकी लाश को सही से रखें. वहीं ये आदेश देने के बाद सोमा गुणवती और उसके भाई के साथ उनके गांव जाने के लिए रवाना हो गई.

कांचीपुरी पहुंची सोमा

कांचीपुरी पहुंचने के कुछ समय बाद ही गुणवती की शादी तय हो गई और गुणवती के विवाह के सात वचन होने के तुरंत बाद ही उसका पति मर गया. वही सोमा ने अपनी पूजा की मदद से उसके पति को जिंदा कर दिया और उसके दोष को खत्म कर दिया. हालांकि सोमा का अपना पुण्य-फल गुणवती को देने से उसके बेटे और पति की मृत्यु हो गई. वहीं जब सोमा अपने घर पहुंची तो उसे उसके बेटे और पति की मृत्यु के बारे में पता चला. जिसके बाद सोमा ने बिना किसी देर के पुण्य फल हासिल करने के हेतु पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान विष्णुजी का नाम लेने शुरू कर दिया और इस वृक्ष की 108 परिक्रमाएं की. जिसके चलते भगवान ने सोमा के परिवार के मरे सभी लोगों को वापस से जीवित कर दिया. इसलिए कहा जाता है कि मौनी अमावस्या या फिर अन्य दिन भगवान को याद करने से एवं व्रत रखने परिवार पर भगवान की कृपा बनी रहती है और लोगों को  पुण्य फल हासिल होता है.