सनातन विज्ञान: जानिये चन्दन टीका, घी दीया और विभूति के इस्तमाल के पीछे का वैज्ञानिक रहस्य

हिन्दू धर्म एक जाग्रत, रूहानी और रहस्यों से भरा धर्म है। हिन्दू धर्म की हर परंपरा, रीति-रिवाज, सिद्धांत, दर्शन आदि सभी में ज्ञान और विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। वैदिक सनातन धर्म की महत्वपूर्ण देन में से एक मोक्ष की धारणा है। मोक्ष का अर्थ होता है पूर्ण मुक्ति। आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञान प्रा‍प्त करना ही मोक्ष है। इसे प्राप्त करने के लिए तीन उपाय है:- अभ्यास, ध्यान और जागृति।

आज हम इस वीडियो ब्लॉग के माध्यम से पूजा विधि से सम्बंधित कुछ उत्पादों की बात करेंगे और उनके पीछे के विज्ञान को समझने और जानने की कोशिश भी करेंगे।

चन्दन टीका: मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें । इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।

घी दीया :  ‘तमसो मा ज्योतिर्गमया’ का अर्थ है अंधकार से उजाले की ओर प्रस्थान करना। आध्यात्मिक पहलू से दीपक ही मनुष्य को अंधकार के जंजाल से उजाले की किरण की ओर ले जाता है। इस दीपक को जलाने के लिए तेल या फिर घी का इस्तेमाल किया जाता है। परन्तु शास्त्रों में दीपक जलाने के लिए खासतौर से घी का उपयोग करने को ही तवज्जो दी जाती है। जिसका एक कारण है घी का पवित्रता से संबंध। घी को बनाने के लिए ही गाय के दूध की आवश्यकता होती है। गाय को हिन्दू मान्यताओं के अनुसार उत्तम दर्जा प्राप्त है। शास्त्रों में दीपक जलाने के लिए तेल से ज्यादा घी को सात्विक माना गया है। दोनों ही पदार्थों से दीपक को जलाने के बाद वातावरण में सात्विक तरंगों की उत्पत्ति होती है, लेकिन तेल की तुलना में घी वातावरण को पवित्र रखने में ज्यादा सहायक माना गया है।

विभूति: भस्म शब्द का अर्थ है “पाप नष्ट करनेवाला और ईश्वर को स्मरण करनेवाला” | ‘भ’ से आशय है, ‘भत्सर्नम्’ (नष्टकरना) और ‘स्म’ से ‘स्मरणम्’ (स्मरणकरना) का आशय है | अतः भस्म लगाने का अभिप्राय है – अमंगल का नाश और दिव्यता का स्मरण | भस्म को ‘विभूति’ भी कहते हैं (जिसका अर्थ है – गौरव), क्योंकि यह लगानेवाले को ‘गौरव’ प्रदान करती है | इसे रक्षा भी कहा जाता है (जिसका अर्थ हाउ सुरक्षा का स्रोत), क्योंकि यह लगाने वाले का निर्मल बना कर, बीमारी और विपत्ति से उसकी रक्षा करती है | भस्म का उपयोग एक औषधि के रूप में भी होता है | बहुत सी आयुर्वेदिक औषधियों में इसका प्रयोग किया जाता है | यह शारीर कि फालतू नमी को सोख लेती है और सर्दी, जुकाम, सिरदर्द आदि नहीं होने देती | उपनिषदों के अनुसार, मस्तिष्क पर भस्म लगाते समय, प्रसिध्द ‘मृत्युञ्जय मन्त्र’ का उच्चारण करना चाहिए

आगे ऐसी ही जानकारियों को वीडियोज़ के लिए बने रहे हमारे साथ। याद रहे कि हमारी आध्यात्मिकता ही हमारी पहचान है और इसे हमें किसी कीमत पर नहीं छोड़ना है।

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नोट: ब्लॉग में बताये गए ओमशान्ति के प्रोडक्ट्स सात्विकता से परिपूर्ण है, इसलिए वीडियो बनाते वक़्त किसी रसायन युक्त ब्रांड का नहीं शुद्ध और सात्विक ॐ शांति के प्रोडक्ट्स का इस्तमाल किया गया है।