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“विमुद्रीकरण ने मेरी जिंदगी बदल दी” – कश्मीरी मुस्लिम का नरेंद्र मोदी को लिखा पत्र हुआ वायरल

श्रीमान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

एक कश्मीरी का जीवन भारत के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोगों से काफी अलग और कठिन है। एक सामान्य कश्मीरी, अपने परिवार को खिलाने के लिए हर रोज मेहनत करता है, अलगाववादियों और सुरक्षा बलों के बीच लगातार संघर्ष के बीच अपना जीवन जीता है, हालांकि यह वास्तव में एक दुखी जीवन है, लेकिन हमें इसके साथ जीना पड़ता है।

मेरा नाम अफजल रहमान है और मैं एक सामान्य कश्मीरी हूँ – और मैं कश्मीर के 2% अलगाववादियों में से नहीं हूं। मैं एक पति, 4 बच्चों का पिता और बूढ़े माता-पिता का बेटा हूँ – और हाँ मैं एक भारतीय और एक कश्मीरी हूं, जिसकी श्रीनगर में “गारमेंट्स की दुकान” है।

अपने बच्चों को एक अच्छा भविष्य देने के बारे में सोचता रहता हूं।  हालांकि, इतने सारे खतरों के बाद भी मैंने अपने बड़े बेटे को इस वर्ष कि “पुलिस प्रवेश परीक्षा” देने के लिए कहा। मेरी एक बेटी 12 वीं कक्षा में पढ़ रही है, और मुझे पता है कि यह साल उसके जीवन, भविष्य और विकास में कितना बड़ा बदलाव लाएगा।

लेकिन पिछले 4 महीनों में मैं बहुत परेशान रहा। पिछले 4 महीने कोई व्यापार नहीं हुआ और लगभग हर दिन कर्फ्यू लगा रहा। काम के बिना एक निम्न मध्यम वर्ग का आदमी कैसे जीवित रह सकता है? किसी तरह, मैंने अपनी बचत से अपने परिवार को दो वक्त का खिलाया, लेकिन समस्या केवल यही नहीं थी।

मेरी बेटी अपनी स्कूली शिक्षा के इतने खास दिनों में कई महिनों तक स्कूल नहीं जा पायी। इस स्थिति ने मेरे बेटे को बहुत हतोत्साहित किया था। उसकी उम्र के युवा जो बेरोजगार थे, सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंक रहे थे। उन्हें अलगाववादियों द्वारा पैसे दिए गए थे। लेकिन एक बेरोजगार आदमी और कर ही क्या सकता हैं? – बूढ़े माता-पिता और रोते हुए बच्चों को खाना खिलाने के लिए वह कुछ पैसों के लिए कुछ भी कर सकता है।

मेरा अपना बेटा है, जो पुलिस में भर्ती होना चाहता था, वह भी मेरी जानकारी के बिना पत्थरबाजों के गिरोह में शामिल हो गया। मुझे इसके बारे में तब पता चला जब पैलेटगन से उसके हाथ पर गोली मार लग गई।

जब संघर्ष थोड़ा कम हुआ उन्होंने घाटी में स्कूलों के जलना शुरू कर दिया। मेरी बेटी का स्कूल भी उन 29 स्कूलों में से एक था जिसे जला दिया गया।

हमारा जीवन पूरी तरह से बर्बाद हो गया था, न तो हम सो सकते है, न ही हम खा सकते है, और न ही हमें मरने की अनुमति थी।

लेकिन फिर हमने 8 नवंबर को रेडियो-कश्मीर पर एक खबर सुनी। आपने 500/1000 के नोटों पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया। इस निर्णय ने हमें डरा दिया। हमारे पास जो बचे हुए पैसे थे ज्यादातर वे भी 500 के नोटों में ही थे। अशांति के कारण कश्मीरियों के लिए नोट बदलने का कोई जरिया नहीं था।

पूरा भारत कालेधन के बारे में सोच रहा है, लेकिन कश्मीरी अपने अस्तित्व के बारे में सोचते हैं। हमने कभी नहीं सोचा था कि आपके इस निर्णय से हमें हमारा जीवन वापस मिल जाएगा, पर वास्तव में ऐसा हुआ।

निर्णय के बाद किसी प्रकार कि पत्थरबाजी नहीं हो रही न ही यहां कोई पत्थरबाज दिख रहा है। एक या दो दिनों में ही घाटी में यातायात शुरू हो गया। हमने अपनी दुकानों को खोला, वहाँ बाजार में लोग थे। हम निश्चित रूप से कुछ खुश चेहरो को देख सकते थे।

भारत के अन्य भागों में लाइनों में खड़े होने में लोगों को तकलीफ होती होगी, लेकिन हम कश्मीरी बैंक कि कतारों में खड़े होने आनंद ले रहे हैं, और मेलजोल कर रहे हैं।

हम अपनी बेटी की परीक्षा को लेकर चिंतित थे लेकिन अब वह अपनी बोर्ड की परीक्षा दे रही है। और केवल मेरी बेटी ही नहीं जो परीक्षा दे रही है बल्कि यहां कई बच्चों औऱ उनके माता पिता इससे खुश हैं। इस साल परीक्षा हॉल में छात्रों की उच्चतम उपस्थिति लगभग 95% थी।

इस निर्णय से सब कुछ सकारात्मक हुआ। हम सब एक साथ बैठते हैं और बातें करते हैं। हमने निष्कर्ष निकाला है कि  इन अलगाववादियों के पास केवल 500/1000 रुपया के नोट थे जिसे अब कोई भी नहीं ले रहा है।

मैं नहीं जानता कि भारत के अन्य हिस्सों में लोग क्या सोचते हैं, लेकिन घाटी में हम इस फैसले से बहुत खुश हैं।

आपका अपना

अफजल रहमान।  

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