सोने के छत्र वाली मां ज्वाला देवी शक्तिपीठ से जुड़े 8 रहस्य, हर भक्तों को जानना चाहिए

हिंदू धर्म में नवरात्रि के अलग और खास मायने बताए गए हैं. इस साल नवरात्रि अब अपने अंतिम चरण में है. मां के भक्त और जिन्होंने व्रत रखा है वे कन्या भोज कराने के बाद माता को विदा करते हैं और उनसे अपने लिए सुख-समृद्धि मांगते हैं. देवी मां के अनेकों मंदिर देश-विदेश में बसे हैं और लोग माता को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा-अर्चना करते हैं. नौ दिनों तक व्रत रखते हैं और फिर 9 कन्याओं का पूजन और भोजन कराकर माता के आशिर्वाद के अधिरारी बनते हैं. देवी मां के अनेकों मंदिर में एक ऐसा भी मंदिर है जहां सम्राट अकबर ने खुद सोने की छत्र चढ़ाई थी क्योंकि वो एक ऐसा मुस्लिम शासक था जो हर धर्म का आदर करता था. इस मंदिर का नाम है मां ज्वाला देवी शक्तिपीठ, जहां हर साल नवरात्रि के पावन अवसर पर भक्त दर्शन के लिए जाते हैं. सोने के छत्र वाली मां ज्वाला देवी शक्तिपीठ से जुड़े 8 रहस्य, जिनके बारे में वहां निरंतर दर्शन करने वाले मां के भक्त भी नहीं जाते होंगे.

सोने के छत्र वाली मां ज्वाला देवी शक्तिपीठ से जुड़े 8 रहस्य

ज्वाला देवी शक्तिपीठ
ज्वाला देवी शक्तिपीठ

1. मां भगवती के शक्तिपीठों में एक है ज्वाला देवी का मंदिर जो हिमाचल प्रदेश में स्थित है. यहां मां जोता वाली के मंदिर को नगरकोट भी कहा जाता है जहां मां के द्वारा किए गए कई चमत्कार हैं. इसमें किसी मूर्ति की नहीं बल्कि पृथ्वी के गर्भ से नकल रही 9 ज्वालाओं की पूजा की जाती है.

2. ज्वाला देवी मंदिर में सदियों से एक प्राकृतिक ज्वाला जल रही है. संख्या में कुल 9 ज्वालाएं हैं जो मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है. यहां का रहस्य जानने के लिए कुछ भू-वैज्ञानिक जुटे हैं लेकिन कई किलोमीटर खुदाई करने के बाद भी वे इस बात का पता नहीं लगा पाए कि जोत को जलाने वाली वो प्राकृतिक गैस कहां से निकलती है.

3. वैसे तो इस मंदिर का निर्माण कब हुआ ये किसी को नहीं पता लेकिन साल 1835 में राजा भूमि चंद ने इस मंदिर का नवीनिकरण कराया था. यहां पर पृथ्वी के गर्भ से निकलती ज्वालाओं पर ही इसे बनाया गया. इन 9 ज्योतियों में महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजीदेवी के नाम की पूजा की जाती है.

ज्वाला देवी शक्तिपीठ
ज्वाला देवी शक्तिपीठ

4. ज्वाला देवी का ये मंदिर 51 शक्तिपीठों में शामिल है. शक्तिपीठ उन्हें कहते हैं जहां माता सती के शरीर के अंग गिरे थे और जब भगवान शिव सती के मृत शऱीर को हाथों में उठाए, दुखी मन से ब्राह्मांड में भटर रहे थे. तब भगवान विष्णु ने शिवजी को उनके व्याकुल मन से बाहर निकालने के लिए सती के मृत शरीर के टुकड़े कर दिए थे.

जिन जगहों पर सती के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ बने. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन शक्तिपीठों पर मां हमेशा वास करती हैं और वहां पर की हुई प्रार्थनाओं को वे सुनती भी हैं.

5. ऐसी भी मान्यता है कि इस मंदिर वाली जगह पर माता सती की जीभ गिरी थी. हिमाचल प्रदेश के कांगडा शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर को खोजने में पांडवों का बहुत बड़ा हाथ माना जाता है.

6. ब्रिटिश हुकुमत में अंग्रेजों ने ज्वाला मंदिर का रहस्य जानने के लिए जमीन में दबी ऊर्जा का उपयोग करने की बहुत कोशिश की लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा. आजादी के बाद भूगर्भ वैज्ञानिकों ने भी इस दिशा में प्रयास किया लेकिन असफल रहे.

7. सम्राट अकबर ने इस ज्वाला को बुझाने का बहुत प्रयास किया कई बार खुदई करवाई लेकिन नाकामयाब रहे. ये नहर आज भी मंदिर की बायीं ओर बहती है जहां अकबर ने खुदाई कराई थी. बाद में वो माता के चमत्कार को मान गया और उसने सोने की छत्र मंदिर के गुंबद में चढ़ाई थी.