हिंदू देवी-देवताओं से जुड़ी है रक्षाबंधन की कहानी, जानिए क्यों मनाया जाता है राखी का पर्व

हिंदू धर्म में कई व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं, हर व्रत-त्योहार का अपना एक महत्व होता है। भारत के त्योहार यहाँ की संस्कृति से जुड़े होते हैं। कई त्योहार मनाने के पीछे के कारणों के बारे में धर्म ग्रंथों में भी लिखा हुआ है। सावन का पवित्र महीना चल रहा है, इस महीने में भी एक महत्वपूर्ण पर्व मनाया जाता है। जी हाँ सावन के आख़िरी दिन यानी सावन की पूर्णिमा को भाई-बहन के प्यार के रूप में रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। ख़ासतौर से यह पर्व भाई-बहन के स्नेह भरे रिश्ते का प्रतीक होता है।

आपको बता दें रक्षाबंधन का यह त्योहार मुख्य रूप से हिंदू और जैन त्योहार के तौर पर मनाया जाता है। यह पर्व हर साल सावन महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है। सावन के महीने में इस पर्व को मनाए जानें की वजह से इसे श्रावणी या सलूनो भी कहा जाता है। रक्षाबंधन में राखी यानी रक्षासूत्र का विशेष महत्व होता है। यह सूत्र कच्चे सूत से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, सोने और चाँदी जैसी महँगी धातुओं से भी बनने लगे हैं। सामान्य तौर पर राखी एक बहन अपने भाई को बाँधती है।

लेकिन कई जगहों पर अलग-अलग परम्परा है। कई जगहों पर बेटियाँ अपने पिता या परिवार के बड़े लोगों, ब्राह्मणों और गुरुओं को भी बाँधती हैं। राखी बाँधने के पीछे मूल भावना प्रेम और रक्षा का आश्वासन ही होता है। लड़कियाँ अपने भाई और पिता को इसी वजह से राखी बाँधती हैं। हिंदू धर्म में राखी से जुड़ी हुई कई कथाएँ भी हैं। जो यह बताती है कि राखी की परम्परा कब और कैसे शुरू हुई।

माता लक्ष्मी ने बांधी थी बलि को राखी:

कहा जाता है कि बगवान विष्णु के प्रभाव से जब राजा बलि को पाताल लोक में जाना पड़ा, इससे देवताओं की रक्षा हुई, तभी से हिंदू धर्म में रक्षाबंधन मनाते हैं। दूसरी तरफ़ उसी समय बलि ने विष्णु से से अपने साथ रहने का आशीर्वाद भी पा लिया था। इससे भगवान विष्णु माता लक्ष्मी से दूर हो गए थे। तब पति को वापस लाने और अपने साथ रखने के लिए माता लक्ष्मी ने बलि को राखी बांधी थी और बदले में अपने पति को वापस पाया था। उसके बाद से राखी की परम्परा शुरू हो गयी। इस तरह से लक्ष्मी जी के सौभाग्य की रक्षा हुई थी। बलि से जुड़ा हुआ श्लोक भी इसी बात की पुष्टि करता है।

श्लोक:

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

अर्थात जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेंद्र राजा बालि को बांधा गया था, उसी सूत्र से में तुझे बाँधता हूँ।

भविष्य पुराण के अनुसार देवराज इंद्र जब दानवों से युद्ध में पराजित हो रहे थे तो उनकी पत्नी इन्द्राणी द्वारा बनाया गए रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र के हाथों पर बाँधते हुए ऊपर दिया गया श्लोक पढ़ा था, जिसकी वजह से इंद्र की रक्षा हुई थी। इसके बाद इंद्र को युद्ध में जीत भी मिली थी। इसे भी रक्षाबंधन की शुरुआत कहा जाता है। स्कन्द पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नाम की कथा में भी रक्षाबंधन का एक प्रसंग मिलता है। द्वापर युग में द्रौपदी ने भी श्रीकृष्ण को राखी बांधी थी। उसी दिन से सावन महीने की पूर्णिमा को रक्षासूत्र बाँधने की प्रथा चली आ रही है।