पाकिस्तानी थिंक टैंक का दावा – भारत के पास इतना मटेरियल और कैपेसिटी की बना सकता है 492 न्यूक्लियर बम

इस्लामाबाद/नई दिल्लीः एक पाकिस्तानी थिंक टैंक की रिसर्च में यह बात सामने निकलकर आई है कि भारत के पास इतना मटेरियल और कैपेसिटी है कि वह 356 से 492 न्यूक्लियर बम बना सकता है।  India Nuclear bomb Material and capacity.

इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज (आईएसएसआई), इस्लामाबाद द्वारा ‘भारतीय असुरक्षित परमाणु कार्यक्रम’ शीर्षक से प्रकाशित इस अध्ययन के को-ऑथर न्यूक्लियर स्कॉलर अदीला आजम, अहमद खान, मोहम्मद अली और समीर खान हैं।

 India Nuclear bomb Material and capacity

 पहले की तुलना में हुई क्षमता में कई गुना वृद्धि –  

आईएसएसआई द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि, “इस गहन अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि भारत के पास 356 से 492 परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त सामग्री और तकनीकी क्षमता है। यह पहले के उन अध्ययनों के उलट है जिनमें परमाणु बम बनाने की भारत की क्षमता को कमतर आंका गया था।

अध्ययन में यह साक्ष्य दिया गया है कि विकासशील देशों और गैर एनपीटी देशों में भारत के पास सबसे बड़ा और सबसे पुराना असुरक्षित परमाणु कार्यक्रम है। विकसित दुनिया और परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) वाले देशों में ना होते हुए भी भारत के पास सबसे बड़े और पुराने असुरक्षित परमाणु कार्यक्रम मौजूद हैं। पाकिस्तान परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अंसार परवेज ने कहा कि यह अध्ययन भारत के परमाणु हथियार बनाने की क्षमता पर नया प्रकाश डालता है।

क्यों की गई है यह स्टडी –                   

इस शोध का उद्देश्य भारत के जटिल परमाणु कार्यक्रम के इतिहास, आकार, विस्तार और क्षमता को समझना था। इसे नई दिल्ली ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी सुरक्षा से बाहर रखा हुआ है।

पाकिस्तानी थिंक टैंक के मुताबिक इस स्टडी का मकसद भारत के जटिल न्यूक्लियर प्रोग्राम की सही हिस्ट्री और साइज व कैपेबिलिटी का पता लगाना था। थिंक टैंक के अनुसार भारत ने यह जानकारी न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफिरेशन ट्रीटी (एनपीटी) से बाहर रखी है। स्टडी में यह साबित करने की कोशिश की गई है कि डेवलपिंग कंट्रीज और गैर एनपीटी देशों में भारत के पास सबसे पुराना और अनसेफ न्यूक्लियर प्रोग्राम है। पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमीशन के पूर्व चेयरमैन अनसार परवेज ने कहा कि यह रिसर्च ऑफिशियल, रिसर्चर्स, स्कॉलर्स और स्टूडेंट्स के लिए भारत की न्यूक्लियर हथियारों की कैपेसिटी को समझने में सहायक होगी।

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