जानें आखिर क्यों शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और उनके साथियों के शव को दो बार जलाया गया था?

शहीद-ए-आजम भगत सिं‍ह का नाम आते ही लोगों के अन्दर जोश भर आता है। उन्होंने किस तरह से भारत की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी इससे कोई भी अनजान नहीं है। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि भगत सिंह और उन्हें साथियों के शवों को फांसी के बाद एक बार नहीं बल्कि दो बार जलाया गया था (Bhagat Singh cremation)। आइये आपको हम इसकी पूरी सच्चाई से रूबरू करवाते हैं।

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अंग्रेजों के लिए यह आसान नहीं था (Bhagat singh cremation):

यह बात गलत होगी कि अंग्रेज डरते नहीं थे, भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी पर चढ़ाने के लिए अंग्रेजों को देश की जनता से विरोध का डर था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 24 मार्च 1931 को फाँसी पर चढ़ाना था, लेकिन जनता के विरोध के डर से उन्हें एक दिन पहले ही फाँसी पर चढ़ा दिया गया। उसके बाद अंग्रेजों ने उनके शवों को कई टुकड़े में बाँट कर चोरी से सतलुज नदी के किनारे हुसैनीवाला के पास जला दिया। देश के लोगों को वीर सपूतों का यह हाल अच्छा नहीं लगा, उन्हें अंग्रेजों से ऐसी बर्बरता की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी। जब अंग्रेजों ने ऐसी घटिया हरकत को अंजाम दिया तब देश के लोगों ने उन्हें इज्जत देने के लिए एक बार फिर से लाहौर में रावी नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया।

अंग्रेजों ने मानवता की सारी हदें पार कर दी:

23 मार्च 1931 को फाँसी पर चढ़ाने के बाद अंग्रेजों ने मानवता की सारी हद को पार कर दिया। मरे हुए के साथ ऐसा कोई मर सकता है इसकी कल्पना किसी भी देशवासी ने नहीं की थी। अंग्रेजों ने शहीदों के शवों को चोरी से कई टुकड़ों में काट दिया ताकि जनता को उनका शव नहीं मिल पाए और चोरी से ही उनको जलाने की कोशिश भी की।

लोगों की भीड़ देखकर अंग्रेज मैदान छोड़कर भागे (Bhagat singh cremation):

जब इस बात की खबर भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर और लाला लाजपत राय की बेटी पार्वती देवी को पता चली तो वह लोग हजारों देशवासियों के साथ वहाँ पहुँच गई जहाँ अंग्रेज अपने इस कुकृत्य को अंजाम दे रहे थे। इतनी संख्या में लोगों को अपनी तरफ आता देखकर अंग्रेजों के होश उड़ गए और वह शहीदों के शवों को अधजला छोड़कर भाग खड़े हुए। इस घटना के बारे में चमनलाल ने भगत सिंह के ऊपर लिखी पुस्तक में विस्तार से बताया है। अंग्रेजों के मैदान छोड़कर भागने के बाद देश वासियों ने उनके शवों को आग से बाहर निकाला और उसे लाहौर अंतिम संस्कार के लिए लाया गया।

शहीदों की शवयात्रा सम्मान के साथ निकाली गई:

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देशवासियों ने शहीदों के शवों को लाहौर लाया और 24 मार्च 1931 की शाम को इन शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए इनकी शवयात्रा को बड़े धूम- धाम के साथ निकाला गया। शहीदों का अंतिम संस्कार रावी नदी के किनारे किया गया, यह वही जगह है जहाँ लाला लाजपत राय का अंतिम संस्कार किया गया था। अंतिम संस्कार के बारे में बताते हुए प्रोफेसर चमन लाल कहते हैं कि इस घटना के बारे में विस्तार से सुखदेव के भाई मथुरा दास थापर ने अपनी किताब ‘मेरे भाई सुखदेव’ में लिखा है।

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