पौराणिक काल से हिन्दू संस्कृति में चली आ रही मानतायों के मुताबिक किसी भी शुभ काम को करने से पहले अगर भगवान की आराधना मन से की जाए तो हमे उस क्षेत्र में सफलता जरूर मिलती है. जब भी भगवान के आराधना की बात होती है तो लोगो मे मन मे तरह तरह के सवाल आने शुरू हो जाते है कि आखिर वह किस भगवान की सबसे पहले पूजा करें? जिससे कि उनके ऊपर भी भगवान की कृपा बनी रहे. शास्त्रों और ग्रंथो की माने तो सभी भगवान में से सबसे पहले पूजा हमारे गणपति बप्पा की किया जाता है और इनकी सबसे पहले पूजा करने के पीछे एक बेहद ही रोचक कहानी छिपी हुई है. आज हम आपको उस कहानी के बारे में बताने के साथ ही उनसे जुड़ी इस बात को बताने वाले है कि आखिर भगवान श्री गणेश का असली मुख कहाँ है जिसे भगवान शिव ने उनके धड़ से अलग कर दिया था..

सबसे पहले हम बात करते है की आखिर गणपति को ही सभी देवताओं में सबसे पहले क्यों पूजा जाता है तो इसके पहले एक रोचक तथ्य सामने आता है कि जब सभी देवी देवताओं के बीच इस बात को लेकर एक बार बहस हो रही थी आखिर सबसे पहले किसकी पूजा की जानी चाहिए. तो इस मुद्दे के ऊपर सबके विचार अलग अलग थे. कोई किसी को समर्थन कर रहे तो कोई किसी और को. सबके बीच ऐसी लड़ाई को देखते हुए सभी देवताओं ने इस बात को लेकर किसी एक निर्णय पर पहुचने के लिए सृष्टि निर्माता के पास पहुँच कर उनके सामने अपनी समस्याओं को रखा. समस्या को सुनने के बाद सृष्टि निर्माता ने इस बात को हल करने के लिए सभी भगवानो को एकत्रित कर यह आदेश दिया कि जो सबसे पहले इस पूरी दुनिया के चक्कर लगाकर आएगा उनकी पूजा सबसे पहले की जाएगी.

सभी देवी देवता अपने अपने वाहन के ऊपर सवार होकर पृथ्वी के भर्मण पर निकल पड़े वही श्री गणेश इस सोच में पड़ गए कि आखिर वह अपनी छोटी सी सवारी को लेकर पूरी पृथ्वी का चक्कर कैसे लगा सकते है? इसके बाद उनके मन मे यह विचार आया की उनकी सारी दुनिया तो उनके माता पिता ही है इस वजह से वह माता पिता के ही एक चक्कर लगा लेते है और उन्होंने ऐसा ही किया. सबसे पहले सृष्टि के निर्माता के पास पहुँचने के बाद स्वयं शंकर जी भी आश्चर्यचकित रह गए और उसके पीछे की पूरी बात को समझने के बाद उन्होंने भगवान श्री गणेश की पूजा सबसे पहले करने की एक घोषणा कर दी. इससे आपको अब इस बात का पता तो चल गया होगा कि आखिर श्री गणेश की ही पूजा सबसे पहले क्यों की जाती है अब हम आपको दूसरी जानकारी बताने वाले है कि आखिर श्री गणेश का असली सिर कहाँ है?

इसके पीछे भी एक बेहद ही रोचक कहानी है – ऐसा बताया जाता है जब एक बार माता पार्वती नहाने गई हुई थी. ठीक उसी वक़्त भूल से भगवान शिव वहाँ आ पहुँचे जिससे माता पार्वती को बेहद ही लज़्ज़ा महसूस हुआ जिसके बाद उन्होंने नहाते वक्त ही अपने शरीर के मैल को छुड़ाकर उसे एक पुतले का रूप दे दिया और उसके अंदर अपनी दिव्य शक्ति से उसमे जान डाल दी और उस जीवित हो चुके पुतले को यह आदेश दिया कि वह स्नान नही कर लेती वहाँ किसी को आने न दे. कुछ वक्त बाद भगवान शिव फिर से वह आ पहुँचे. इस बार उन्हें भगवान गणेश ने माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें अंदर जाने से मना कर दिया जिसके बाद भगवान शिव गुस्से में आकर उसके सिर को ही काट डाला.

जब इसकी खबर माता पार्वती को लगी तो उन्होंने भगवान शिव से इस बात बात की विनती करने लगी कि वह उनके पुत्र समान गणेश को फिर से जिंदा करें जिसके बाद भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वह उत्तर दिशा में जाये और जिस किसी का भी सिर सबसे पहले जो प्राणी मिले उसका सिर कलम कर वह उनके पास लाकर सौप दे. भगवान शिव की आज्ञा को मानते हुए उनके गण उत्तर दिशा की ओर चल पड़े और उन्हें सबसे पहले एक हाथी के बाचे के सिर मिला और उन्होंने वह सिर लाकर भगवान शिव को सौप दिया जिसके बाद शिव ने भगवान गणेश को हाथी का सिर लगाकर जिंदा कर दिया. यह बात तो उनके दूसरे सिर की थी अब आपको उनके असली सिर के बारे में बताते है आखिर वह सिर कहाँ है?

एक मान्यता के मुताबिक भगवान श्री गणेश का सिर चंद्र लोक में स्तिथ है वही दूसरी मान्यता के मुताबिक उनका सिर उत्तराखंड स्तिथ पाताल भुवनेश्वर में है. ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान शिव ने गणेश के ऊपर हाथी का मुख लगे था तो उनके असली सिर को उन्होने वहाँ से उठाकर एके गुफा के अंदर सुरक्षित रख दिया था. ऐसा आज भी कहा जाता है आज भी उनका यह मुख वहाँ मौजूद है पर वहाँ जाना किसी भी आम इंसान के लिए एक मुश्किल काम है. उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले से करीब 180 कम की दूरी पर स्तिथ इस इस गुफा तक पहुचने के रास्ते बेहद खतरनाक है. 160 फ़ीट लंबी और 90 फ़ीट चौड़ी बताई जाने वाली इस गुफा के बारे में यह बात बताये जाती है कि यह गुफा आज भारत के पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित घोषित कर दिया गया है.

इस गुफा तक पहुचने के लिए लोगो को कम से कम 100 सीढियाँ चढ़नी पड़ती है और जब आप उस गुफा के पास पहुँचते है तो आपको एक अलग ही तरह का आनंद प्राप्त होता है. इस गुफा से जुड़ी ऐसी भी मान्यता है कि 33 करोड़ देवी देवताओं का निवास स्थल भी यही है. इस गुफा के बारे में ऐसा भी कहा जाता है यह गुफा अंदर ही अंदर कैलाश पर्वत से जुड़ी हुई है. यहाँ के मौसम की बात करे तो यहाँ का मौसम हमेशा ही सुहावना होता है. काफी उचाई पर स्तिथ होने की वजह से इस गुफा के आसपास उचाई पर उगने वाले चीड़ देवदार इत्यादि के वृक्ष देखने को मिल जाते है। पास में ही स्तिथ पंचचुली घाटी से देखने पर यहाँ का नज़ारा बेहद ही खूबसूरत दिखाई पड़ता है. इनकी खूबसूरती में उगता और ढलता हुआ सूरज चार चांद लगा देता है.

पाताल भुवनेशर जाने के लिए सबसे अच्छा मौसम गर्मियों के होता है जब वहाँ मौसम काफी सुहाना होता है. यहाँ जाने के पहले आप इस बात का भी ख्याल रखे कि आप सर्दियों से बचने के लिए अपने साथ भरपूर मात्रा में गर्म कपड़े भी रखे हुए हो. अगर आप इस जगह पर जाना चाहते है तो आपको यहाँ तक जाने के लिए वायु और थल के माध्यम ही उपलब्ध हैे. एरोप्लेन से जाने पर आपको उसके नजदीकी हवाई अड्डे नैनी सैनीपर उतरकर वहाँ से एक कैब या फिर बस के द्वारा जा सकते है वही ट्रेन से जाने पर आप गुफा से 192 कम की दूरी पर मौजूद काठगोदाम तक ही जा सकते है उसके बाद आपको किसी और माध्यम से गुफा तक जाना होगा. वही सड़क मार्ग से जाने की बात करें तो यह गुफा सड़क मार्गो से सीधी जुड़ी हुई है.

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