अध्यात्म

भगवान शिव और सती की कहानी से जुड़ा है लोहड़ी का त्योहार

भारत, त्योहार और पर्व का देश है जहां हर मौसम में कई सारे त्योहार मनाए जाते हैं और ठंड के मौसम के प्रमुख त्योहार हैं मकरसंक्रांति और लोहरी । जैसा कि हमारे यहां हर त्योहार के पीछे कोई ना कोई धार्मिक या पौराणिक वजह होती है वैसे ही लोहड़ी मनाने के पीछे भी कुछ मान्यताएं हैं। जिसमें से एक मान्यता भगवान शिव और देवी सति से जुड़ा है.. आज हम आपको उसी के बारे में बताने जा रहे हैं।

देश में 14 जनवरी या 15 जनवरी के दिन जहां मकर संक्रांति मनाई जाती है वहीं इससे एक दिन पहले उत्तर भारत के राज्यों में लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है। दरअसल भारत के अलग-अलग राज्यों में मकर संक्रांति के दिन या उसके आस-पास तिथि को कोई न कोई त्योहार मनाने की परंपरा है। जैसे कि  तमिल लोग इस दिन पोंगल का त्योहार मनाते हैं..वहीं असम में इसे बिहू के रूप में मनाने की परंपरा है। इस तरह पूरे भारत में यह विभिन्न रूपों में मनाया जाता है।

जहां तक लोहड़ी की बात है तो मकर संक्रांति से एक रोज पहले की रात को उत्तर भारत के राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा और कुछ पड़ोसी राज्यों में ‘लोहड़ी ‘ मनाई जाती है। खासकर पंजाबियों के लिए लोहड़ी सबसे प्रमुख त्योहार और पूरे पंजाब में इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इसकी मनाने की तैयारी लोहड़ी के कुछ दिन पहले से ही शुरू हो जाती है । बच्चे लोहड़ी के लिए कुछ दिनों पहले से ही लकड़ियां, मेवे और रेवड़ियां इक्ठ्ठा करते हैं । लोहड़ी की शाम लोग सामूहिक रूप से एकत्र होते हैं और आग जलाकर उसमें रेवड़ी, खील, मक्का और मूंगफली की आहुति देते हैं .. और उस आग के चारों ओर लोग चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं।

वैस तो लोहड़ी के बारे में कई सारी मान्यताएं हैं जिसमे से हिन्दु धर्म के दृष्टिकोण से एक मान्यता ये है कि राजा दक्ष प्रजापति की बेटी शिव की पत्नी देवी सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही हर वर्ष ये अग्नि जलाई जाती है। दरअसल देवी सति ने अपने पिता द्वारा अपने पति शिवजी के अपमान से क्षुब्द होकर यज्ञ के अग्निकुण्ड में अपनी आहुति दे दी थी। ऐसे में कहा जाता है कि उन्ही के स्तुति में ये अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर शादीशुदा बेटियों को मायके से ‘त्योहारी’ भेजी जाती है जिसमें कपड़े, मिठाई और रेवड़ी दी जाती है। ऐसे में यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति का प्रायश्चित्त इसमें दिखाई पड़ता है।

वैसे पंजाब में लोहड़ी को लेकर दुल्ला भट्टी की एक कहानी भी प्रचलित है। असल में दुल्ला भट्टी मुगल शासक अकबर के शाषन काल में पंजाब में रहता था जिसे पंजाब के नायक की उपाधि से भी नवाजा गया था।  उस समय में संदल बार में लड़कियों को अमीर लोगों की गुलामी के लिए बलपूर्वक बेचा जाता था। ऐसे में दुल्ला भट्टी ने अपने दम पर ना सिर्फ उन लड़कियों को छुड़ाया बल्कि उन सभी की शादी भी करवाई। दरअसल लोहड़ी के सभी गानों में केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता हैं।

 

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