भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी।
हर्षित महतारी मुनि मनहारी अद्भुत रूप विचारी।।

अयोध्या का बच्चा-बच्चा तुलसीदास की इस चौपाई को अच्छे से जानता है। अयोध्या में छोटे-बड़े कुल मिलाकर लगभग साढ़े आठ हजार मंदिर और मठ हैं। यहाँ पिछले चार सौ सालों से लगातार यह गाया जा रहा है। लेकिन 23 दिसंबर 1949 की सुबह ख़ास थी। उस दिन सुबह की पहली किरण निकलने से पहले ही यह बात पुरे अयोध्या में फैल गयी कि भगवान राम प्रकट हो गए हैं। भगवान राम बाल रूप में मंदिर के गर्भ गृह में पधार चुके हैं।

उस दिन सुबह लगभग 7 बजे के आस-पास जब अयोध्या थाने के एस. एच. ओ. रामदेव दुबे रूटीन जाँच के लिए मंदिर वाली जगह पहुँचे तो वहाँ लोगों का ताँता लगा हुआ था। दोपहर होते-होते वहाँ लगभग 5000 लोग इकठ्ठा हो गए। आस-पास के गांवों में यह खबर आग की तरह फैल गयी थी। लोग भगवान राम के बल रूप के दर्शन के लिए मंदिर के पास पहुँचे हुए थे। यह सब देखकर पुलिस प्रशासन हैरानी में पड़ा हुआ था। भगवान राम किसी और मंदिर में नहीं बल्कि जन्मस्थली कही जाने वाली बाबरी मस्जिद के गर्भगृह में प्रकट हुए थे।

इस मस्जिद के बारे में कहा जाता है कि इसे भगवान राम के प्राचीन मंदिर को तोड़कर बनाया गया है। धीरे-धीरे खंडहर बन चुकी उस मस्जिद को केवल शुक्रवार के दिन जुम्मे की नमाज के लिए ही खोला जाता था। अन्य दिनों में उधर शायद ही कोई आता-जाता दिखाई देता था। मस्जिद की दीवार के बहरी हिस्से में एक बड़ा चबूतरा भी था, जिसे राम चबूतरा के नाम से जाना जाता था। चबूतरे पर भगवान राम की एक बाल रूप की मूर्ति भी थी। उसके दर्शन के लिए उस अमे बहुत कम लोग ही जुटते थे। लेकिन उस दिन के बाद से सबकुछ बदल गया।

उस चमत्कारी रात यानी 23 दिसंबर 1949 की को सदियों से राम चबूतरे पर विराजमान बाल रूपी भगवान राम की मूर्ति मस्जिद के मुख्य गुम्बद के ठीक नीचे वाले कमरे में प्रकट हुई थी। भगवान का भोग लगाने के लिए सीता या कौशल्या रसोई में भोग बनता था। आपको बता दें राम चबूतरा और सीता रसोई दोनों निर्मोही अखाड़ा के नियंत्रण में आते थे। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी, नरसिम्हा राव ने अपनी किताब “अयोध्या: 6 दिसंबर 1992 में उस एफआईआर का भी जिक्र किया है, जो 23 दिसंबर 1949 को लिखी गयी थी।

उस समय अयोध्या के एस. एच. ओ. रामदेव दुबे ने भारतीय दंड सहिंता की धारा 147, 448, 295 के तहत मुकदमा दर्ज किया था। उन्होंने अपने एफआईआर में लिखा, “रात में लगभग 50-60 लोग मस्जिद में दीवार फांदकर घुसे और वहाँ भगवान राम के मूर्ति की स्थापना की। दीवार के अन्दर और बाहर उन्होंने सीताराम भी लिखा। ड्यूटी पर तैनात कॉन्स्टेबल ने जब ऐसा करने से माना किया तो उसकी एक ना सुनी। पी.ए.सी. को भी बुलाया गया, लेकिन तब तक वो लोग मंदिर में प्रवेश कर चुके थे।

बात भले ही अयोध्या कि थी लेकिन पहले यह मामला लखनऊ पहुँचा फिर दिल्ली और पुरे देश में हडकंप मच गया। उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु थे और गृहमंत्री सरदार पटेल थे। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पं. गोविन्द वल्लभ पन्त थे और गृह मंत्री लालबहादुर शास्त्री थे। उस समय तक देश का संविधान लालू नहीं हुआ था। देश चला रहे नेताओं को कोई परेशानी नहीं थी। केंद्र और प्रदेश की सरकार ने माना की जो हुआ वह सही नहीं है और दोनों समुदायों की आपसी सहमती से ही इसका हल निकले तो अच्छा होगा।

धोखे से पूजा स्थल पर कब्ज़ा करना दोनों ही सरकारों को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने निर्णय किया कि पहले वाली स्थिति कायम की जाये। उस समय यूपी के मुख्य सचिव भगवान सहाय ने फ़ैजाबाद के जिलाधिकारी और मुख्य उप-आयुक्त के. के. के. नायर लिखित आदेश दिया कि फिर से रामलला की मूर्ति को मस्जिद से निकालकर राम चबूतरे पर रख दे। यह देश उसी दिन 23 दिसंबर 1949 को दोपहर ढाई बजे तक नायर को दिया गया था। सहाय का आदेश था कि अगर इसके लिए बल प्रयोग करना पड़े तो भी संकोच ना किया जाये। लेकिन नायर ने आदेश मानने से इनकार कर दिया।

नायर ने सहाय को जवाब में भेजा, “राम लाला की मूर्ति को गर्भगृह से निकलकर राम चबूतरे पर स्थापित करना आसान नहीं है। ऐसा करने से अयोध्या, फ़ैजाबाद और आस-पास के गांवों में सांप्रदायिक दंगे होने की स्थिति हो जाएगी। जिला प्रशासन के अधिकारीयों और पुलिस वालों की जान भी खतरे में पड़ जाएगी। नायर ने सरकार को बताया कि अयोध्या का कोई पंडित मूर्तियों को गर्भगृह से हटाने को तैयार नहीं होगा। कोई पंडित ऐसा पाप करने के लिए तैयार नहीं होगा।“ यूपी सरकार के ऊपर नायर के इन तर्कों का कोई असर नहीं हुआ और उन्होने प्राणी स्थिति बहाल करने के आदेश दिए।

इसके जवाब में 27 दिसंबर 1949 को नायर ने अपनी चिट्ठी लिखकर इस्तीफे की बात कही। उन्होंने सरकार को एक सुझाव भी दिया कि इस भयंकर स्थिति से निपटने के लिए कोर्ट के ऊपर छोड़ दिया जाये। कोर्ट का फैसला आने तक विवादित ढांचे के बाहर एक जालीनुमा गेट लगा दिया जाये, जिससे भक्त बाहर से ही रामलला के दर्शन कर सकें। भगवान को भोग लगाने वाले पुजारियों की संख्या घटाकर एक कर देनी चाहिए। सुरक्षा घेरा बनाकर ढाँचे के बाहर उत्पातियों को जाने से रोका जा सकता है। सरकार ने नायर का इस्तीफ़ा स्वीकार करने की बजाय उनके सुझावों को माना। इस तरह राम लाला की मूर्ति विवादित ढांचे के गर्भगृह में ही रह गयी और विवाद का नया बीज डाला गया। आज देश की राजनीति इसी विवाद के इर्द-गिर्द घूम रही है।

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